भारतीय संगीत में अलंकार का महत्त्व और प्रकार

भारतीय शास्त्रीय संगीत में अलंकार का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अलंकार का शाब्दिक अर्थ 'आभूषण' या 'गहना' होता है। जिस प्रकार आभूषण किसी व्यक्ति की सुंदरता बढ़ाते हैं, ठीक उसी तरह अलंकार स्वरों के विशेष नियमों और क्रमबद्ध पैटर्न से संगीत में मिठास और आकर्षण घोलते हैं। रियाज़ की शुरुआत में अलंकारों का अभ्यास करने से गले में लयकारी और स्वरों की शुद्धता आती है।

संगीत विद्वानों ने अपने-अपने ग्रंथ और काल के अनुसार अलंकारों की संख्या अलग-अलग मानी है। प्राचीन संगीत ग्रंथ 'संगीत रत्नाकर' के अनुसार वर्णों के आधार पर अलंकारों की कुल संख्या 56 बताई गई है। वहीं, प्रसिद्ध संगीतकार पंडित शारंगदेव ने कुल 63 अलंकारों का उल्लेख किया है। इसके अलावा, पंडित अहोबल द्वारा सात प्रमुख तालों पर आधारित कुल 7 मुख्य अलंकार माने गए हैं।

संक्षेप में कहें तो अलंकार मुख्य रूप से चार प्रकार के वर्णों (स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी) पर निर्भर करते हैं। चाहे आप नए गायक हों या अनुभवी कलाकार, अलंकारों का निरंतर अभ्यास ही संगीत की कला को निखारने की सबसे मजबूत नींव है।

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