संसार में शत्रुता और मनुष्य का व्यवहार

इस संसार में जन्म लेते ही कोई किसी का जन्मजात शत्रु नहीं होता है। मनुष्य के जीवन में वैर-भाव का उदय उसकी अपनी परिस्थितियों और सबसे बढ़कर उसके व्यवहार और अहंकार के कारण होता है। जब कोई व्यक्ति अपने भीतर अंहकार को पालने लगता है, तो वह दूसरों को छोटा समझने की भूल कर बैठता है। यही वह बिंदु है जहाँ से मतभेद और मनमुटाव की शुरुआत होती है।

संसार का एक शाश्वत नियम है कि हम दूसरों को जो देते हैं, वही हमारे पास लौटकर आता है। यदि हमारा व्यवहार प्रेम, करुणा और आदर से भरा है, तो शत्रुता का कोई स्थान नहीं रह जाता। इसके विपरीत, कड़वी वाणी और घमंड अच्छे-भले संबंधों में भी कड़वाहट घोल देते हैं। मनुष्य का अपना विवेक ही यह तय करता है कि वह समाज में मित्र बनाएगा या शत्रु।

अतः, यदि हम अपने अहंकार का त्याग कर दें और सभी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और विनम्र दृष्टिकोण अपनाएं, तो इस संसार में हमारा कोई शत्रु नहीं होगा। वास्तविक शत्रु बाहर नहीं, बल्कि इंसान के अपने भीतर छिपे दुर्गुणों में होता है, जिसे आत्म-सुधार और सौम्य व्यवहार से जीता जा सकता है।

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