भारतीय संगीत में श्रुति और 'सा' का स्थान

भारतीय शास्त्रीय संगीत का मूल आधार श्रुति और स्वर का अद्भुत तालमेल है। हमारे संगीतशास्त्र में एक सप्तक के भीतर ध्वनि की सूक्ष्म बारीकियों को समझते हुए कुल २२ श्रुतियों की कल्पना की गई है। इन २२ श्रुतियों में से कुछ निश्चित दूरी पर स्थित ७ प्रमुख श्रुतियों को छांट लिया गया और उन्हीं को शुद्ध स्वरों के रूप में मान्यता दी गई। ये सात स्वर हैं— षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गंधार (ग), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (ध) और निषाद (नी)।

मुख्य स्वर 'सा' (षड्ज) की बात करें तो प्राचीन ग्रंथकारों के अनुसार 'सा' की ४ श्रुतियाँ मानी गई हैं। इन चारों श्रुतियों के नाम तीव्रा, कुमुद्वती, मंदा और छंदोवती हैं। 'सा' पूरे संगीत का आधार स्वर होता है, इसलिए इसकी श्रुतियों का संगीत में विशेष महत्व है।

श्रुति वह सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनि है जिसे कान स्पष्ट रूप से सुन और पहचान सकें। इन्हीं २२ श्रुतियों के वैज्ञानिक विभाजन से सात शुद्ध और पाँच विकृत स्वरों का ढांचा तैयार हुआ है, जो हमारे शास्त्रीय संगीत को अद्वितीय और मधुर बनाता है।

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