सितार और उसके परदों का अनोखा संसार

भारतीय शास्त्रीय संगीत में सितार का एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी मधुर और गूंजती हुई ध्वनि हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सितार से इतनी खूबसूरत तान निकालने के पीछे इसके परदों (Frets) का बहुत बड़ा योगदान होता है?

आमतौर पर एक मानक सितार में 13, 16 या 19 परदे होते हैं। ये परदे पीतल या स्टील के धातु से बने घुमावदार टुकड़े होते हैं, जिन्हें सितार की डांड (गर्दन) पर रेशम या तांत के धागों से बांधा जाता है। इन परदों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि ये चल-परदे (Movable Frets) कहलाते हैं। इसका मतलब है कि वादक अपने बजाए जाने वाले राग के अनुसार इन्हें थोड़ा ऊपर या नीचे खिसकाकर सही स्वर और श्रुति सेट कर सकता है।

संगीत की दुनिया में सिर्फ सितार ही नहीं, बल्कि कई अन्य तार वाले वाद्यों में भी परदों का उपयोग किया जाता है, लेकिन विभिन्न वाद्यों में इनकी संख्या उनकी बनावट और बजाने की शैली के आधार पर अलग-अलग निर्धारित होती है। सितार में मुख्य तारों के अलावा नीचे कुछ विशेष तार भी होते हैं जिन्हें तरब के तार कहा जाता है। जब मुख्य तार पर कोई स्वर बजाया जाता है, तो तरब के तार स्वतः ही गूंजकर संगीत को एक अलौकिक और गहरा प्रभाव प्रदान करते हैं। यही कारण है कि परदों का सही स्थान पर होना और सितार की बारीक समझ ही एक कुशल वादक की असली पहचान बनती है।

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