भारतीय संगीत में रागों की जातियाँ और उनका वर्गीकरण
भारतीय शास्त्रीय संगीत की मधुर परंपरा में राग का स्थान सबसे प्रमुख है। किसी भी राग की पहचान और उसकी प्रकृति को समझने के लिए उसमें प्रयोग होने वाले स्वरों की संख्या को जानना बहुत जरूरी होता है। स्वरों के इसी प्रयोग के आधार पर रागों को मुख्य जातियों में विभाजित किया गया है।
जब किसी राग के आरोह (चढ़ते क्रम) और अवरोह (उतरते क्रम) में केवल पाँच स्वर प्रयोग किए जाते हैं, तो उसे औडव जाति का राग कहा जाता है। ठीक इसी तरह, यदि राग में छह स्वर लगते हैं तो वह षाडव जाति का राग बनता है, और यदि सातों स्वरों का पूर्ण प्रयोग होता है तो उसे सम्पूर्ण जाति का राग कहते हैं।
संगीत की इस व्यवस्था में आरोह और अवरोह के स्वर अलग-अलग भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी राग के आरोह में सात और अवरोह में पाँच स्वर प्रयुक्त हों, तो उसे सम्पूर्ण-औडव राग कहा जाता है। इस प्रकार इन तीन मुख्य श्रेणियों के संयोजन से कुल 9 उपजातियाँ बनती हैं, जो रागों के विविधतापूर्ण सौंदर्य को प्रकट करती हैं।
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