यह सवाल आज पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में गूंज रहा है कि आखिर चीन को कौन खाता है? इसका सीधा और कड़वा जवाब यह है कि चीन को किसी बाहरी दुश्मन की जरूरत नहीं है, बल्कि उसका अपना ही बेकाबू कर्ज का जाल, ढहती हुई जनसांख्यिकी और घरेलू रियल एस्टेट का भयानक संकट उसे भीतर से खोखला कर रहा है। ड्रैगन बाहर से जितना आक्रामक दिखता है, अंदरूनी मोर्चे पर उसकी बुनियाद उतनी ही तेजी से दरक रही है।

साम्यवाद का मुखौटा और खोखली होती आर्थिक बुनियाद

शी जिनपिंग के नेतृत्व में बीजिंग ने हमेशा अपनी छवि एक अपराजेय आर्थिक इंजन के रूप में पेश की है। मगर आंकड़े सच नहीं छुपा पाते। पिछले तीन दशकों की अभूतपूर्व तरक्की के बाद, अब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की नीतियां ही उसके गले की फांस बन चुकी हैं। बीजिंग की 'डेड-ट्रैप डिप्लोमेसी' यानी कर्ज के जाल में दूसरे देशों को फंसाने की रणनीति अब खुद उसके ऊपर उलटी पड़ रही है। चीन के स्थानीय प्रांतों पर अरबों डॉलर का ऐसा कर्ज है जिसे चुका पाना नामुमकिन है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'हिडन डेट' या छुपा हुआ कर्ज कहते हैं, जो किसी भी वक्त पूरी अर्थव्यवस्था को मंदी के गर्त में धकेल सकता है। इसके अलावा, दशकों पुरानी 'वन चाइल्ड पॉलिसी' का भयानक खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। चीन की आबादी न सिर्फ घट रही है, बल्कि वह बूढ़ी हो रही है। युवाओं की कमी के कारण कारखानों में काम करने वाले हाथ कम हो रहे हैं, जिससे उसकी विनिर्माण क्षमता पर सीधे चोट पहुंची है।

रियल एस्टेट का दलदल और शी जिनपिंग की नीतियां

चीन की जीडीपी का लगभग तीस फीसदी हिस्सा रियल एस्टेट सेक्टर से आता था। एवरग्रैंड और कंट्री गार्डन जैसी विशालकाय कंपनियों के धराशायी होने के बाद यह पूरा सेक्टर ताश के पत्तों की तरह ढह गया है। लाखों चीनी नागरिकों ने अपनी जिंदगी भर की कमाई जिन मकानों को खरीदने में लगा दी थी, वे आज 'भूतिया शहर' (Ghost Cities) बनकर खड़े हैं। लोग अधूरे प्रोजेक्ट्स की वजह से बैंकों की किश्तें चुकाने से इनकार कर रहे हैं। यह वित्तीय विद्रोह चीनी बैंकिंग सिस्टम की रीढ़ तोड़ रहा है। शी जिनपिंग की सख्त रेगुलेटरी कार्रवाइयों ने अलीबाबा और टेनसेंट जैसी तकनीकी दिग्गज कंपनियों के पर कतर दिए, जिससे निजी क्षेत्र में डर का माहौल पैदा हो गया। जब घरेलू निवेशक और उद्यमी ही अपनी सरकार पर भरोसा खोने लगें, तो पूंजी का पलायन लाजिमी है। विदेशी कंपनियां अब 'चाइना प्लस वन' की रणनीति अपनाकर भारत और वियतनाम जैसे देशों का रुख कर रही हैं, जो बीजिंग के लिए सबसे बड़ा झटका है।

भू-राजनीतिक अलगाव और इसके व्यावहारिक निहितार्थ

इस आर्थिक गिरावट के व्यावहारिक परिणाम बेहद गंभीर और दूरगामी हैं। अपनी अंदरूनी कमजोरियों और जनता के आक्रोश से ध्यान भटकाने के लिए चीनी नेतृत्व अक्सर ताइवान पर हमले की धमकी देता है या दक्षिण चीन सागर में आक्रामकता बढ़ाता है। लेकिन यह रणनीति उस पर भारी पड़ रही है। अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे बड़े बाजार अब चीन पर अपनी निर्भरता को तेजी से कम कर रहे हैं। आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) का यह बिखराव चीन के निर्यात आधारित मॉडल को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है। बेरोजगारी दर, विशेषकर युवाओं में, इतनी अधिक हो चुकी है कि सरकार ने इसके आंकड़े जारी करना तक बंद कर दिया था। जब किसी देश का युवा वर्कफोर्स निराश होकर घरों में बैठ जाता है, तो वह सामाजिक अशांति का बारूद बन जाता है। चीन आज इसी बारूद के ढेर पर बैठा है, जहां उसकी अपनी नीतियां ही उसे धीरे-धीरे निगल रही हैं।