शून्य से नीचे 273.15 डिग्री सेल्सियस। यह कोई काल्पनिक संख्या नहीं बल्कि परम शून्य तापमान है, जहां प्रकृति की हर हरकत थम जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस जमा देने वाली कगार पर ब्रह्मांड की सबसे ठंडी गैस कौन सी है? वह गैस कोई और नहीं बल्कि लिक्विड हीलियम (तरल हीलियम) है, जिसे वैज्ञानिक प्रयोगों में अपनी पराकाष्ठा पर ले जाकर पूर्ण परम शून्य के बेहद करीब पहुँचाया जाता है। यह गैस आम बर्फ से लाखों गुना अधिक ठंडी हो सकती है।

परम शून्य और हीलियम का ऐतिहासिक सफरनामा

ठंडक की इस अंतिम सीमा को समझने की यात्रा बेहद रोमांचक रही है। उन्नीसवीं सदी के अंत तक वैज्ञानिक हवा के घटकों को द्रवित करने की होड़ में थे। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन को तो आसानी से काबू कर लिया गया, लेकिन हीलियम एक ऐसा जिद्दी तत्व साबित हुआ जिसने वैज्ञानिकों के पसीने छुड़ा दिए। डच भौतिक विज्ञानी हेइके कामरलिंग ओन्स ने साल 1908 में पहली बार हीलियम को द्रवित करने में सफलता हासिल की थी। उन्होंने हीलियम गैस को लगभग -269 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया। इस खोज ने विज्ञान जगत में तहलका मचा दिया। हीलियम ब्रह्मांड का दूसरा सबसे हल्का तत्व है, लेकिन जब इसे अत्यधिक ठंडे तापमान पर लाया जाता है, तो इसकी भौतिक अवस्था बिल्कुल बदल जाती है। यह एक ऐसी अवस्था है जहां सामान्य भौतिकी के नियम घुटने टेक देते हैं और क्वांटम यांत्रिकी का जादू शुरू होता है। इतिहास गवाह है कि हीलियम की इस ठंडी प्रकृति ने ही हमें अतिचालकता (Superconductivity) जैसी अद्भुत खोजों से रूबरू कराया, जिसने आधुनिक तकनीक की दिशा बदल दी।

गैस को परम शून्य के करीब ठंडा करने की जटिल प्रक्रिया

किसी गैस को ब्रह्मांड के सबसे ठंडे स्तर पर ले जाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक बेहद जटिल और चरणबद्ध तकनीकों का उपयोग करते हैं। आइए समझते हैं यह कैसे काम करता है:

सबसे पहले, हीलियम गैस पर अत्यधिक दबाव डाला जाता है और फिर उसे अचानक फैलने दिया जाता है। इस प्रक्रिया को 'जूल-थॉमसन प्रभाव' कहते हैं, जिससे गैस का तापमान तेजी से गिरता है। जब गैस तरल में बदल जाती है, तो असली खेल शुरू होता है।

इसके बाद 'लेजर कूलिंग' तकनीक का उपयोग किया जाता है। वैज्ञानिक गैस के परमाणुओं पर विपरीत दिशा से लेजर बीम मारते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे तेजी से दौड़ती गेंद पर लगातार छोटी गेंदें मारकर उसकी गति को धीमा कर दिया जाए। चूंकि तापमान कुछ और नहीं बल्कि परमाणुओं की गति का ही माप है, इसलिए परमाणुओं के धीमे होते ही तापमान गिर जाता है।

आखिरी चरण में 'इवेपोरेटिव कूलिंग' यानी वाष्पीकरण द्वारा ठंडक पैदा की जाती है। इसमें सबसे गर्म परमाणुओं को चुंबकीय जाल से बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे केवल सबसे ठंडे और शांत परमाणु ही बचे रह जाते हैं। इस तरह गैस का तापमान परम शून्य के एक डिग्री के अरबवें हिस्से तक पहुँच जाता है।

बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट: जब गैस सुपरफ्लुइड बन गई

इस चमत्कारी ठंडक को समझने के लिए हमें प्रयोगशाला के एक अनोखे प्रयोग को देखना होगा। जब वैज्ञानिकों ने रूबिडियम और हीलियम जैसी गैसों को परम शून्य के अत्यंत निकट ठंडा किया, तो पदार्थ की एक नई अवस्था का जन्म हुआ, जिसे बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट (BEC) कहा जाता है। इस अवस्था में गैस के सभी परमाणु अपनी व्यक्तिगत पहचान खो देते हैं और एक विशाल 'महा-परमाणु' की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

उदाहरण के लिए, जब तरल हीलियम-4 को 2.17 केल्विन से नीचे ठंडा किया जाता है, तो यह एक 'सुपरफ्लुइड' में बदल जाता है। इस स्थिति में गैस की श्यानता (viscosity) पूरी तरह शून्य हो जाती है। यदि आप इसे किसी बीकर में रखेंगे, तो यह बिना किसी घर्षण के बर्तन की दीवारों पर ऊपर चढ़कर बाहर की तरफ बहने लगेगी। यह देखना किसी जादू से कम नहीं है क्योंकि यहाँ गुरुत्वाकर्षण के नियम भी बेअसर दिखाई देते हैं। यह अनोखा व्यवहार साबित करता है कि अत्यधिक ठंडी गैसें केवल ठंडी नहीं होतीं, बल्कि वे ब्रह्मांड के मूलभूत नियमों को समझने की सबसे बड़ी कुंजी हैं।