रामायण में शेषनाग: अनंत का दिव्य स्वरूप

शेषनाग हिंदू पौराणिक कथाओं में एक प्रमुख दैवीय सर्प हैं, जिन्हें अक्सर अनंत के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम उनकी अनन्तता को दर्शाता है – वे ब्रह्मांड के प्रलय के बाद भी जीवित रहते हैं। रामायण में शेषनाग का सीधा उल्लेख सीता के जन्म या राम-रावण युद्ध से नहीं जुड़ा, लेकिन उनकी उपस्थिति विष्णु के आधार के रूप में बहुत महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु अपने योग निद्रा के समय शेषनाग के सहस्रफन में टिके हुए होते हैं, जो समुद्र या क्षीरसागर पर विश्राम करते हैं।

शेषनाग कश्यप और दक्षप्रजापति की पुत्री कद्रू की संतान माने जाते हैं। सभी नागों की उत्पत्ति कद्रू से हुई मानी जाती है, लेकिन शेषनाग उनमें सबसे श्रेष्ठ हैं। कहा जाता है कि लक्ष्मण और बलराम दोनों शेषनाग के अवतार माने जाते हैं – लक्ष्मण रामायण काल में और बलराम महाभारत में। इस प्रकार वे भगवान विष्णु के अंश या उनके सेवक के रूप में धरती पर आए।

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