क्या आप जानते हैं कि देश के सबसे अमीर राज्य के मुख्यमंत्री को मिलने वाला वेतन, किसी आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य के मुख्यमंत्री से आधा भी हो सकता है? जी हां, यह कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि हमारे भारतीय संविधान की एक अनोखी हकीकत है। सीधे शब्दों में कहें तो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री का वेतन कोई केंद्रीय संस्था या राष्ट्रपति तय नहीं करते, बल्कि इसका पूरा अधिकार खुद उस राज्य की विधानसभा के पास होता है। संविधान के अनुच्छेद 164(5) के तहत हर राज्य को अपनी मर्जी से यह राशि तय करने की पूरी आजादी दी गई है।

वेतन निर्धारण की संवैधानिक जड़ें और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ और संविधान सभा में राज्यों के प्रशासनिक ढांचे पर बहस चल रही थी, तब इस बात पर गंभीर मंथन हुआ कि क्या पूरे देश के मुख्यमंत्रियों के लिए एक समान वेतन ढांचा होना चाहिए। लेकिन भारत की विविधता और राज्यों की अलग-अलग वित्तीय स्थिति को देखते हुए निर्माताओं ने एक विकेंद्रीकृत मार्ग चुना। संविधान के निर्माताओं का मानना था कि हर

विशेषज्ञों का इस पर क्या कहना है

संविधान और राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों के मुख्यमंत्री का वेतन तय करने का अधिकार राज्य विधानसभाओं को देना भारतीय संघीय ढांचे (Federal Structure) की खूबसूरती को दर्शाता है। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि चूंकि हर राज्य की आर्थिक स्थिति, जनसंख्या और राजस्व स्रोत अलग-अलग हैं, इसलिए एक समान वेतन नीति व्यावहारिक नहीं होगी। उदाहरण के लिए, तेलंगाना जैसे समृद्ध राज्य और पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों की वित्तीय क्षमता में भारी अंतर है।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों द्वारा इस व्यवस्था की आलोचना भी की जाती है। उनका तर्क है कि चूंकि विधायक और मुख्यमंत्री खुद ही अपना वेतन तय करने वाले कानून को पारित करते हैं, इसलिए इसमें हितों का टकराव (Conflict of Interest) देखने को मिलता है। कई