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भारत की सियासत का दिल कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश जब आर्थिक प्रगति के नए कीर्तिमान गढ़ रहा है, ठीक उसी वक्त राज्य का एक हिस्सा घोर उपेक्षा का दंश झेल रहा है। नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) और बुनियादी ढाँचे के आँकड़े गवाह हैं कि बुंदेलखंड और विशेषकर बहराइच व श्रावस्ती जैसे तराई के सीमावर्ती जिले उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्र हैं। यहाँ की 70 फीसदी से अधिक आबादी आज भी घोर बहुआयामी विपन्नता के साए में जीने को विवश है।
ऐतिहासिक विसंगति और भौगोलिक अभिशाप की पृष्ठभूमि
इस क्षेत्रीय असंतुलन की जड़ें कोई रातोंरात नहीं पनपीं, बल्कि इसके पीछे सदियों की भू-राजनीतिक उपेक्षा और भौगोलिक विवशताएँ रही हैं। बुंदेलखंड का इलाका हमेशा से कठोर पठारी चट्टानों, कम वर्षा और अनिश्चित मानसूनी चक्र से त्रस्त रहा है, जिसने यहाँ की कृषि व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। दूसरी ओर, नेपाल की सीमा से सटे तराई के जिले जैसे श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर हर साल घाघरा और राप्ती जैसी नदियों की विनाशकारी बाढ़ का शिकार बनते हैं। जब देश के अन्य हिस्सों में हरित क्रांति के चलते आधुनिक खेती और उद्योगों का जाल बिछ रहा था, तब ये सीमावर्ती अंचल प्रशासनिक उदासीनता और जमींदारी व्यवस्था के अवशेषों से जूझ रहे थे। ऐतिहासिक रूप से, इन क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम रहा और सामंती ताकतों ने आर्थिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार जमाए रखा, जिससे आम जनमानस कभी भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ ही नहीं पाया।
पिछड़ेपन का दुष्चक्र: आखिर कैसे काम करती है यह व्यवस्था?
किसी क्षेत्र का इस कदर पिछड़ जाना कोई इत्तफाक नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक-आर्थिक दुष्चक्र का परिणाम है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी काम करता है। सबसे पहले, लचर बुनियादी ढांचा (खराब सड़कें और बिजली की कमी) उद्योगों को आकर्षित करने में पूरी तरह नाकाम रहता है। जब उद्योग नहीं होते, तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर शून्य हो जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है रोजगार की तलाश में बड़े पैमाने पर पुरुषों का पलायन, जो गांवों को केवल वृद्धों और महिलाओं के भरोसे छोड़ देता है। खेती पूरी तरह वर्षा जल पर निर्भर है, इसलिए कर्ज के बोझ तले दबे किसान पारंपरिक खेती से आगे नहीं सोच पाते। पूंजी का अभाव बैंक ऋण सुविधाओं की कमी के कारण और गहरा जाता है। स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली इस स्थिति को और विकट बनाती है; कुपोषण के शिकार बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं और सस्ते श्रम के रूप में असंगठित क्षेत्रों में खप जाते हैं। यह सिलसिला बिना रुके लगातार चलता रहता है।
श्रावस्ती का कटु सत्य: विकास के दावों की जमीनी हकीकत
इस भयानक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को समझने के लिए श्रावस्ती जिले का उदाहरण देखना ही काफी होगा। भगवान बुद्ध की तपोभूमि होने के बावजूद, यह जिला आज साक्षरता और मानव विकास सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर खड़ा है। यहाँ की महिला साक्षरता दर आश्चर्यजनक रूप से बेहद कम है, जो सीधे तौर पर सामाजिक रूढ़िवादिता और स्कूलों की दूरी को बयां करती है। इकौना विकास खंड के सुदूर गांवों में आज भी पक्के रास्तों का अभाव है, जिसके चलते प्रसव के दौरान महिलाओं को अस्पताल पहुंचाना एक भयंकर चुनौती बन जाता है। रोज़गार का साधन केवल साल में एक बार होने वाली धान की खेती है, और यदि उस दौरान बाढ़ आ गई, तो पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। श्रावस्ती की यह स्थिति स्पष्ट करती है कि कागजी योजनाएं और हकीकत के बीच कितनी गहरी खाई है।
इस विषय पर विशेषज्ञों का क्या कहना है
आर्थिक और सामाजिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों का पिछड़ापन सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों का परिणाम है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर जैसे नीति आयोग के 'आकांक्षी जिलों' में बहुआयामी गरीबी (MPI) का स्तर काफी ऊंचा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल कृषि पर निर्भरता और औद्योगिकीकरण का अभाव युवाओं को पलायन के लिए मजबूर करता है। भू-जल की समस्या और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी विकास की गति को रोकती हैं। जानकारों के मुताबिक, जब तक इन क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर प्रदान नहीं किए जाएंगे, तब तक क्षेत्रीय असमानता के इस अंतर को पूरी तरह से पाट पाना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।
---अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: उत्तर प्रदेश के इन क्षेत्रों के पिछड़ेपन के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर: इन क्षेत्रों के पिछड़े होने के प्रमुख कारणों में बुनियादी ढांचे (जैसे बेहतर सड़कें, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाएं) का अभाव, कम साक्षरता दर, उद्योगों की कमी और केवल पारंपरिक कृषि पर अत्यधिक निर्भरता शामिल है। इसके अतिरिक्त, पूर्वांचल का एक बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ से प्रभावित होता है, जबकि बुंदेलखंड लगातार सूखे की मार झेलता है, जिससे यहां आर्थिक स्थिरता नहीं आ पाती।
प्रश्न 2: सरकार द्वारा इस क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
उत्तर: सरकार द्वारा नीति आयोग के 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' के तहत इन क्षेत्रों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण स्तर में सुधार के विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। इसके साथ ही, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, डिफेंस कॉरिडोर और विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से कनेक्टिविटी और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि क्षेत्रीय असंतुलन को कम किया जा सके।
---एक विचारणीय प्रश्न
सरकारी नीतियों, बड़े एक्सप्रेसवे और विकास के तमाम दावों के बावजूद, उत्तर प्रदेश के इन सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अंतिम व्यक्ति तक वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता और विकास की मुख्यधारा कब तक पहुंच पाएगी?
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