वैश्विक कूटनीति के बिसात पर भारत का कोई एक स्थायी दोस्त नहीं है, बल्कि उसके हितों का एक मजबूत जाल है। सीधे शब्दों में कहें तो आज रूस हमारा पारंपरिक सुरक्षा कवच है, अमेरिका आधुनिक तकनीक और आर्थिक ताकत का साझेदार है, और फ्रांस एक ऐसा विश्वसनीय साथी है जिसने मुश्किल वक्त में कभी वीटो का सौदा नहीं किया। नई दिल्ली की विदेश नीति अब भावुकता से नहीं, बल्कि व्यावहारिक राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है।

गुटनिरपेक्षता से बहु-संरेखण का सफर और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

शीत युद्ध के दौर में जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी, तब जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति ने भारत को एक स्वतंत्र आवाज दी। मगर इतिहास गवाह है कि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय जब अमेरिकी नौसेना का सातवां बेड़ा भारत को डराने आ रहा था, तब सोवियत संघ ने अपनी परमाणु पनडुब्बियां भेजकर हमारी संप्रभुता की रक्षा की थी। वह मोड़ भारतीय मानस में रूस के प्रति एक अटूट विश्वास पैदा कर गया।

बीते तीन दशकों में वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदला है। सोवियत संघ के विघटन और चीन के आक्रामक उभार ने नई दिल्ली को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया। आज का भारत किसी एक खेमे में शामिल होने के बजाय 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) की राह पर चल रहा है। इसका मतलब है कि हम एक ही समय में रूस से सस्ता कच्चा तेल भी खरीद सकते हैं और अमेरिकी नेतृत्व वाले 'क्वाड' (Quad) संगठन में शामिल होकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की घेराबंदी भी कर सकते हैं। यह कूटनीतिक चपलता ही आधुनिक भारत की असली ताकत है।

भू-राजनीतिक समीकरण: त्रिकोण में फंसे रिश्ते और महाशक्तियों का संतुलन

सच्चे दोस्त की परख संकट में होती है। जब साल 2020 में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प हुई, तब भारत के रणनीतिक साझेदारों की असली भूमिका सामने आई। फ्रांस ने तुरंत राफेल लड़ाकू विमानों की डिलीवरी तेज कर दी, जबकि अमेरिका ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर खुफिया जानकारी और सर्दियों के विशेष गियर साझा किए। यह इस बात का सबूत है कि पश्चिमी देश अब भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एशिया में स्थिरता का सबसे बड़ा स्तंभ मानते हैं।

दूसरी तरफ, रूस के साथ भारत का रिश्ता एक अलग ही धरातल पर है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पूरी पश्चिमी दुनिया ने मॉस्को पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा और रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाकर अपने नागरिकों को महंगाई से बचाया। हालांकि, मॉस्को का बीजिंग की तरफ बढ़ता झुकाव नई दिल्ली के लिए एक नई चिंता का विषय जरूर है। यही कारण है कि भारत अब रक्षा आपूर्ति के लिए केवल रूस पर निर्भर नहीं है; वह इजरायल से मिसाइल तकनीक और फ्रांस से अत्याधुनिक नौसैनिक इंजन हासिल कर अपने टोकरे में अंडों को अलग-अलग रख रहा है।

रणनीतिक स्वायत्तता का व्यावहारिक महत्व और भारत का प्रभाव

इस पूरे समीकरण का सीधा असर भारत की घरेलू सुरक्षा और आर्थिक प्रगति पर पड़ता है। भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर 8 प्रतिशत से अधिक की जीडीपी विकास दर को बनाए रखना है, जिसके लिए विदेशी निवेश और सुरक्षित व्यापारिक मार्ग अनिवार्य हैं। खाड़ी देशों, विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब के साथ भारत के बदलते रिश्ते इसका जीवंत उदाहरण हैं। कभी पाकिस्तान के पाले में दिखने वाले ये देश आज कश्मीर मुद्दे पर भारत के रुख का मौन समर्थन करते हैं और भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की आवाज बनकर खुद को विश्व मंच पर स्थापित किया। जब भारत अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के लिए अनाज और वैक्सीन की आपूर्ति सुनिश्चित करता है, तो वह यह साबित करता है कि उसकी दोस्ती सिर्फ महाशक्तियों तक सीमित नहीं है। भारत आज एक ऐसी धुरी बन चुका है, जिसके बिना दुनिया का कोई भी बड़ा मंच—चाहे वह जलवायु परिवर्तन हो या आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई—अधूरा है।

आम गलतफहमियां और विशेषज्ञ सलाह

भारत की विदेश नीति और इसके वैश्विक संबंधों को समझते समय अक्सर कुछ भ्रांतियां सामने आती हैं। सबसे आम गलतफहमी यह है कि भारत किसी एक विशेष गुट का हिस्सा है। सच्चाई यह है कि भारत की नीति हमेशा 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की रही है। इसका अर्थ है कि भारत किसी देश का अंधभक्त मित्र या पूर्ण विरोधी नहीं बनता, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है।

एक और भ्रम यह है कि पुराने दोस्त हमेशा एक जैसे रहते हैं। बदलते वैश्विक दौर में संबंध भी बदलते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि भारत के विदेश संबंधों का आकलन करते समय इन बातों का ध्यान रखें:

मल्टी-अलाइनमेंट की नीति: भारत एक ही समय में अमेरिका के साथ 'क्वाड' (QUAD) में काम कर सकता है और रूस-चीन के साथ 'ब्रिक्स' (BRICS) का भी हिस्सा रह सकता है। इसे विरधाभास के बजाय संतुलित कूटनीति के रूप में देखें।

आर्थिक और रणनीतिक हित: आधुनिक समय में दोस्ती केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यापार, रक्षा तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा पर टिकी होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या रूस आज भी भारत का सबसे भरोसेमंद दोस्त है?

रूस ऐतिहासिक रूप से भारत का एक बेहद मजबूत और आजमाया हुआ साझेदार रहा है, खासकर रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में। हालांकि, वर्तमान में भारत अपने रक्षा उपकरणों के लिए केवल एक देश पर निर्भर न रहकर विविधता ला रहा है और अमेरिका, फ्रांस तथा इजराइल के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है।

2. भारत और अमेरिका के संबंधों की वर्तमान स्थिति क्या है?

भारत और अमेरिका के संबंध इस समय अपने सबसे बेहतर दौर में हैं। दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, रक्षा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और प्रौद्योगिकी साझेदारियों में एक-दूसरे के महत्वपूर्ण सहयोगी बन चुके हैं, हालांकि व्यापार से जुड़े कुछ मुद्दों पर मतभेद बने रहते हैं।

3. पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्ते कैसे हैं?

भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighborhood First) नीति के तहत बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, चीन और पाकिस्तान के साथ रणनीतिक चुनौतियां बरकरार हैं, फिर भी भारत अपने अन्य पड़ोसियों के साथ मजबूत आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध बनाए हुए है।

संपादकीय निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में "न कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई स्थायी दुश्मन, केवल स्थायी हित होते हैं।" भारत ने इस सिद्धांत को बखूबी अपनाया है। आज का भारत एक ग्लोबल प्लेयर है, जो अपनी संप्रभुता से समझौता किए बिना दुनिया की सभी प्रमुख शक्तियों के साथ मिलकर काम करने की क्षमता रखता है।