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दुनिया की जनसांख्यिकी एक अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ी है। प्यू रिसर्च सेंटर के ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालें तो एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आती है: मुस्लिम आबादी वैश्विक जनसंख्या की तुलना में दोगुनी से भी अधिक तेज़ी से बढ़ रही है। क्या इसका मतलब यह है कि 21वीं सदी के उत्तरार्ध तक इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा धर्म बन जाएगा? इसका सीधा और संक्षिप्त उत्तर है — हाँ, सांख्यिकीय दर और प्रजनन क्षमता के वर्तमान रुझान तो यही स्पष्ट संकेत दे रहे हैं।
जनसांख्यिकीय बदलाव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आधार
किसी भी धर्म या समुदाय का फैलाव केवल धार्मिक रूपांतरणों या प्रचार-प्रसार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसके पीछे गहरा जनसांख्यिकीय ताना-बाना काम करता है। बीसवीं सदी के अंत से ही वैश्विक जनसंख्या विश्लेषकों ने पाया कि विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच प्रजनन दर में भारी अंतर है। ईसाई धर्म ऐतिहासिक रूप से सदियों तक दुनिया का सबसे बड़ा धर्म बना रहा, मुख्य रूप से यूरोप और अमेरिका में इसकी मजबूत पकड़ की वजह से। हालांकि, 20वीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता का उभार हुआ और जन्मदर में भारी गिरावट दर्ज की गई। इसके ठीक उलट, मध्य पूर्व, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया के मुस्लिम बहुल इलाकों में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक संरचना के कारण परिवार का आकार अपेक्षाकृत बड़ा बना रहा। यह ऐतिहासिक और सामाजिक असमानता ही आज के विशाल जनसांख्यिकीय बदलाव की नींव साबित हुई है।
यह सांख्यिकीय बदलाव कैसे काम करता है: चरण-दर-चरण विश्लेषण
यह जनसांख्यिकीय रूपांतरण अचानक नहीं हो रहा, बल्कि यह तीन मुख्य घटकों के जरिए योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहा है:
उच्च प्रजनन दर: मुस्लिम महिलाओं की औसत प्रजनन दर (प्रति महिला 2.9 बच्चे) अन्य सभी धार्मिक समूहों के औसत (2.2 बच्चे) से काफी अधिक है। आबादी का आकार स्थिर रखने के लिए 2.1 की दर आवश्यक होती है, जिसे कई गैर-मुस्लिम देश हासिल करने में नाकाम रहे हैं।
युवा आबादी का अनुपात: मुस्लिम समुदाय की औसतन आयु दुनिया के किसी भी अन्य प्रमुख धार्मिक समूह से कम है। 2015 के आंकड़ों के अनुसार, मुसलमानों की मध्यिका आयु (median age) लगभग 24 वर्ष थी, जबकि गैर-मुसलमानों की मध्यिका आयु 32 वर्ष थी। इसका सीधा मतलब यह है कि इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने जीवन के सबसे उर्वर (childbearing) वर्षों में प्रवेश कर चुका है या करने वाला है।
निम्न मृत्यु दर बनाम उच्च बाल उत्तरजीविता: चिकित्सा सुविधाओं में सुधार के कारण विकासशील मुस्लिम बहुल देशों में शिशु मृत्यु दर में भारी कमी आई है, जिससे जन्म लेने वाले बच्चों की जीवित रहने की संभावना बढ़ी है और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है।
एक ठोस उदाहरण: उप-सहारा अफ्रीका और यूरोप का तुलनात्मक अध्ययन
इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए नाइजीरिया और यूरोप के जनसांख्यिकीय मॉडल की तुलना करना सबसे सटीक उदाहरण होगा। नाइजीरिया में, जहाँ एक विशाल मुस्लिम आबादी निवास करती है, औसतन एक महिला पाँच से अधिक बच्चों को जन्म देती है। इसके विपरीत, यूरोप के स्पेन या इटली जैसे पारंपरिक रूप से ईसाई या धर्मनिरपेक्ष देशों में यह दर घटकर 1.3 से 1.4 के बीच सिमट गई है। इस विरोधाभास का असर यह हो रहा है कि जहाँ यूरोपीय देशों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और आबादी सिकुड़ रही है, वहीं नाइजीरिया जैसे देशों में युवा आबादी का ऐसा विस्फोट हो रहा है जो आने वाले समय में वैश्विक धार्मिक आँकड़ों के संतुलन को पूरी तरह उलट कर रख देगा।
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