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दुनिया में शायद ही कोई ऐसा मुल्क हो जिसने साम्राज्यवाद का दंश इतने लंबे समय तक झेला हो जितना हमारे भारत ने। जब लोग पूछते हैं कि भारत कब से कब तक गुलाम रहा, तो अधिकांश लोगों के दिमाग में 1857 से 1947 या फिर 1757 से 1947 का दौर घूमता है। लेकिन अगर हम बारीकी से देखें तो भारत में विदेशी आक्रांताओं और औपनिवेशिक ताकतों की हुकूमत का कुल दौर लगभग 700 से 1000 सालों के बीच फैला हुआ माना जा सकता है।
भारत की परतंत्रता का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और शुरुआत
भारतीय उपमहाद्वीप हमेशा से अपनी अकूत संपत्ति, रेशम, मसालों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण विदेशी हमलावरों का मुख्य आकर्षण केंद्र रहा है। यदि हम राजनीतिक संप्रभुता के खोने की शुरुआत को समझें, तो इसकी नींव 8वीं सदी में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध आक्रमण से ही पड़ने लगी थी। इसके बाद 11वीं सदी में महमूद गजनवी और 12वीं सदी के अंत में मोहम्मद गोरी के हमलों ने भारत के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया। तराइन के दूसरे युद्ध में 1192 ईस्वी में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की पराजय के पश्चात दिल्ली की सत्ता पर विदेशी मुस्लिम शासकों का अधिपत्य स्थापित हुआ।
दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद मुगलों का दौर आया, जिन्होंने सदियों तक देश के विशाल भूभाग पर एक छत्र राज किया। हालांकि, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से मुगलों का दौर पूरी तरह से 'औपनिवेशिक गुलामी' नहीं माना जाता क्योंकि वे यहीं बस गए थे और यहाँ का धन बाहर नहीं भेजा। असली और वीभत्स गुलामी का दौर तब शुरू हुआ जब यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों, विशेषकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने पैर पसारे। 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद भारत का आर्थिक दोहन और वास्तविक परतंत्रता का कालखंड शुरू हुआ, जो 15 अगस्त 1947 को समाप्त हुआ।
विदेशी ताकतों ने भारत को गुलाम कैसे बनाया: चरणबद्ध प्रक्रिया
भारत की स्वतंत्रता का हरण अचानक एक ही दिन में नहीं हुआ, बल्कि यह एक अत्यंत सुव्यवस्थित और दूरदर्शी रणनीति का प्रतिफल था। इस प्रक्रिया को हम मुख्य चरणों में समझ सकते हैं:
व्यापार के बहाने प्रवेश और आंतरिक गुटबाजी का लाभ: 17वीं शताब्दी में जहांगीर के दरबार में सर थॉमस रो के आगमन के साथ अंग्रेजों ने केवल व्यापारिक अधिकार मांगे थे। धीरे-धीरे उन्होंने देखा कि भारत के स्थानीय राजा और नवाब आपस में ही प्रतिद्वंद्विता और वैमनस्य में उलझे हुए हैं। अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' (Divide and Rule) की कूटनीति अपनाकर इन रियासतों की आपसी दुश्मनी को भुनाया।
सैन्य हस्तक्षेप और दीवानी अधिकार: 1757 के प्लासी युद्ध और 1764 के बक्सर युद्ध ने अंग्रेजों को सिर्फ व्यापारी से शासक बना दिया। बक्सर की जीत के बाद 1765 की इलाहाबाद संधि के तहत कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के राजस्व वसूली (दीवानी) के अधिकार मिल गए। भारतीय धन से ही सेना तैयार करके भारत के ही राजाओं को हराने का यह अनोखा दुष्चक्र शुरू हुआ।
सहायक संधि और हड़प नीति: लॉर्ड वेलेस्ली की सहायक संधि (Subsidiary Alliance) और बाद में लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' (Doctorine of Lapse) ने बची-कुची देशी रियासतों की संप्रभुता को भी निगल लिया। झांसी, नागपुर और सतारा जैसी रियासतें इसी नीति के तहत ब्रिटिश साम्राज्य में मिला ली गईं।
सांस्कृतिक और प्रशासनिक नियंत्रण: 1835 में मैकाले की शिक्षा नीति के माध्यम से अंग्रेजों ने एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो "रक्त और रंग से तो भारतीय हो, लेकिन अपनी पसंद, विचारों और बुद्धि से अंग्रेज हो।" 1857 की क्रांति के बाद शासन की बागडोर सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चली गई और भारत पूर्णतः एक ब्रिटिश उपनिवेश बन गया।
एक प्रत्यक्ष उदाहरण: बंगाल का पतन और कंपनी का एकाधिकार
भारत की गुलामी की वास्तविक दास्तान को समझने के लिए 18वीं सदी के बंगाल का उदाहरण देखना सबसे मुफीद होगा। उस दौर में बंगाल पूरे मुगल साम्राज्य का सबसे समृद्ध प्रांत था, जहाँ कपड़ा, रेशम और शोरा का अटूट व्यापार था। 1756 में जब युवा नवाब सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों की मनमानी और किलेबंदी का विरोध किया, तो ब्रिटिश सेनापति रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब के ही सेनापति मीर जाफर को गद्दी का लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया।
23 जून 1757 को प्लासी के मैदान में जो युद्ध हुआ, वह वास्तव में कोई युद्ध था ही नहीं, बल्कि एक छल-कपट का सौदा था। नवाब की विशाल सेना के बड़े हिस्से ने मीर जाफर के इशारे पर हथियार ही नहीं उठाए। इस विश्वासघात के कारण सिराजुद्दौला की हार हुई और मीर जाफर को कठपुतली नवाब बना दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल के खजाने से करोड़ों रुपये लूटे और धीरे-धीरे पूरे बंगाल की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया। इस एक घटना ने साबित कर दिया कि कैसे एक व्यापारिक कंपनी ने भारतीय शासकों की कमजोरियों का फायदा उठाकर एक पूरे समृद्ध उपमहाद्वीप को अपनी गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया।
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