विषय-सूची
- 1. इतिहास के पन्नों से: सोवियत साम्राज्य की नींव और उसके पतन की पृष्ठभूमि
- 2. विघटन की क्रमिक प्रक्रिया: कैसे एक के बाद एक ताश के पत्तों की तरह ढहती चली गई महाशक्ति
- 3. एक ज्वलंत मिसाल: यूक्रेन का अलग होना और सोवियत संघ का अंतिम पतन
- 4. विशेषज्ञों की राय
- 5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- 6. भविष्य के लिए एक बड़ा सवाल
दिसंबर 1991 के एक बर्फीले दिन क्रेमलिन के ऊपर फहराता लाल झंडा हमेशा के लिए नीचे उतार लिया गया। पलक झपकते ही परमाणु शक्ति से लैस महाशक्ति इतिहास के पन्नों में सिमट गई। अगर सीधे सवाल का जवाब दें, तो सोवियत संघ कुल 15 स्वतंत्र गणराज्यों में विभाजित हुआ था। बिना एक भी महायुद्ध लड़े इतना बड़ा साम्राज्य कभी नहीं ढहा। इस घटना ने न केवल शीत युद्ध का अंत किया, बल्कि पूरे यूरेशिया की सीमाएं और राजनीति हमेशा के लिए बदलकर रख दीं।
इतिहास के पन्नों से: सोवियत साम्राज्य की नींव और उसके पतन की पृष्ठभूमि
1917 की बोल्शेविक क्रांति के मलबे से उपजे इस विशाल साम्राज्य ने 1922 में औपचारिक रूप से आकार लिया। मास्को के केंद्रीय नेतृत्व के तहत विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और नृजातीय समूहों को एक छतरी के नीचे बांधा गया। दशकों तक साम्यवादी विचारधारा और कड़े दमनकारी नियंत्रण ने इन 15 गणराज्यों को जोड़कर रखा। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की होड़, कमजोर आर्थिक मॉडल और अति-केंद्रीयकृत शासन तंत्र ने अंदर ही अंदर दीमक की तरह इस विशाल व्यवस्था को चाटना शुरू कर दिया था। 1980 के दशक तक आते-आते, अनाज की किल्लत, घटते तेल के दाम और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया। मिखाइल गोर्बाचेव के सत्ता में आने के बाद शुरू की गई सुधार नीतियां—'ग्लासनोस्त' (खुलापन) और 'पेरेस्त्रोइका' (पुनर्गठन)—का मकसद तंत्र को बचाना था, लेकिन उसने सदियों से दबे असंतोष और राष्ट्रवाद की ज्वाला को भड़का दिया, जिसने विघटन की प्रक्रिया को पूरी तरह अपरिहार्य बना दिया।
विघटन की क्रमिक प्रक्रिया: कैसे एक के बाद एक ताश के पत्तों की तरह ढहती चली गई महाशक्ति
यह बिखराव रातारात नहीं हुआ, बल्कि चरणबद्ध तरीके से सामने आया:
पहला चरण: बाल्टिक राज्यों की बगावत। लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया ने सबसे पहले अपनी संप्रभुता का बिगुल फूंका। 1990 में लिथुआनिया ने खुद को आजाद घोषित कर दिया, जिससे मास्को के नियंत्रण पर पहली भारी चोट पड़ी।
दूसरा चरण: संप्रभुता की होड़। बाल्टिक देशों की देखा-देखी अन्य गणराज्यों में भी स्थानीय नेतृत्व मजबूत होने लगा। बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में रूसी सोवियत संघात्मक समाजवादी गणराज्य ने भी अपनी स्वायत्तता की दिशा में कदम बढ़ाए।
तीसरा चरण: अगस्त 1991 का तख्तापलट। कट्टरपंथियों द्वारा गोर्बाचेव को नजरबंद करके किया गया असफल तख्तापलट का प्रयास सोवियत तंत्र के लिए अंतिम कील साबित हुआ। इसने केंद्रीय सत्ता के इकबाल को पूरी तरह खत्म कर दिया।
चौथा चरण: बेलावेज़ा समझौता और औपचारिक अंत। 8 दिसंबर 1991 को रूस, यूक्रेन और बेलारूस के नेताओं ने बेलावेज़ा समझौते पर हस्ताक्षर करके आधिकारिक रूप से सोवियत संघ के अस्तित्व को समाप्त कर दिया और स्वतंत्र राष्ट्रों का राष्ट्रकुल (CIS) गठित किया। इसके कुछ ही दिनों बाद 25 दिसंबर को गोर्बाचेव ने इस्तीफा दे दिया।
एक ज्वलंत मिसाल: यूक्रेन का अलग होना और सोवियत संघ का अंतिम पतन
सोवियत संघ के विघटन को समझने के लिए यूक्रेन का मामला सबसे अहम मिसाल है। यूक्रेन सोवियत संघ का दूसरा सबसे शक्तिशाली और आर्थिक रूप से समृद्ध गणराज्य था। वहां विशाल औद्योगिक ढांचा, कृषि योग्य उपजाऊ भूमि और भारी संख्या में परमाणु हथियार मौजूद थे। जब अगस्त 1991 में यूक्रेन की संसद ने आजादी का प्रस्ताव पारित किया और फिर 1 दिसंबर 1991 को हुए जनमत संग्रह में 90 प्रतिशत से अधिक नागरिकों ने स्वतंत्रता के पक्ष में मतदान किया, तो सोवियत संघ का बचा रहना असंभव हो गया। रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन को भी अहसास हो गया कि यूक्रेन के बिना किसी भी तरह के नए सोवियत या संघ ढांचे की कल्पना निरर्थक है। यूक्रेन का अलग होना ही वह निर्णायक घटना थी जिसने सोवियत संघ के ताबूत में आखिरी कील ठोकी। इसके बाद ही 15 अलग-अलग देशों का नक्शा दुनिया के सामने आया—रूस, यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अर्मेनिया, अज़रबैजान, जॉर्जिया, मोल्दोवा, लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया।
विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय मामलों और इतिहास के विशेषज्ञों का मानना है कि सोवियत संघ (USSR) का विघटन 20वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में से एक था। जाने-माने इतिहासकारों का तर्क है कि यह पतन केवल एक रात में नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे दशकों से चली आ रही लचर आर्थिक नीतियां, अत्यधिक सैन्य खर्च और अत्यधिक केंद्रीकृत व्यवस्था की कमियां थीं। मिखाइल गोर्बाचेव की 'ग्लासनोस्ट' (खुलापन) और 'पेरेस्त्रोइका' (पुनर्गठन) की नीतियों ने आम जनता को अपने अधिकार मांगने का अवसर दिया, जिसने अनजाने में विभिन्न गणराज्य के भीतर राष्ट्रीयता और अलगाववादी आंदोलनों को गति दे दी। भू-राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस विभाजन ने दशकों लंबे शीत युद्ध का अंत किया और वैश्विक शक्ति संतुलन को रातों-रात एकध्रुवीय दुनिया में बदल दिया, जहाँ अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बन गया। आज भी विशेषज्ञ इस बात पर बहस करते हैं कि क्या इस विघटन को सही कूटनीतिक प्रयासों से रोका जा सकता था या यह इतिहास की एक अपरिहार्य नियति थी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. सोवियत संघ के टूटने के बाद कौन-कौन से 15 नए देश बने थे?
सोवियत संघ के विघटन के बाद कुल 15 स्वतंत्र राष्ट्र विश्व मानचित्र पर उभरे। इन्हें क्षेत्रीय आधार पर इस प्रकार बांटा जा सकता है: सबसे बड़ा देश रूस बना; बाल्टिक क्षेत्र में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया आए; पूर्वी यूरोप में यूक्रेन, बेलारूस और मोलदोवा बने; काकेशस क्षेत्र में जॉर्जिया, आर्मेनिया और अज़रबैजान का निर्माण हुआ; और मध्य एशिया में कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान तथा ताजिकिस्तान स्वतंत्र देश बने। इनमें से रूस को संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ का मुख्य उत्तराधिकारी राज्य माना गया।
2. सोवियत संघ का आधिकारिक विघटन किस तारीख को हुआ था और इसके मुख्य कारण क्या थे?
सोवियत संघ का आधिकारिक और कानूनी विघटन 26 दिसंबर 1991 को सोवियत गणराज्य की सर्वोच्च परिषद द्वारा घोषित किया गया था। इससे ठीक एक दिन पहले, 25 दिसंबर 1991 को अंतिम सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने इस्तीफा दे दिया था। विघटन के मुख्य कारणों में गंभीर आर्थिक मंदी, खाद्य पदार्थों की भारी कमी, विभिन्न गणराज्यों में पनपती स्वतंत्रता की मांग, राजनीतिक भ्रष्टाचार और 1991 का विफल तख्तापलट का प्रयास शामिल थे, जिसने कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ को पूरी तरह कमजोर कर दिया था।
भविष्य के लिए एक बड़ा सवाल
यदि सोवियत संघ का विभाजन 15 अलग-अलग देशों में नहीं हुआ होता, तो क्या आज की वैश्विक राजनीति अधिक शांत और स्थिर होती, या फिर यह विघटन आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी और अपरिहार्य आवश्यकता थी?
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