विषय-सूची
- 1. रूसी गेहूं उद्योग का इतिहास और बाजार पृष्ठभूमि
- 2. रूस में गेहूं की कीमतें कैसे तय होती हैं: चरण-दर-चरण प्रक्रिया
- 3. केस स्टडी: मिस्र और अफ्रीकी देशों पर रूसी गेहूं दरों का सीधा प्रभाव
- 4. What experts say about it
- 5. Frequently Asked Questions
- 6. क्या वैश्विक खाद्य सुरक्षा की पूरी डोर केवल कुछ चुनिंदा देशों की नीतियों और बाजारों के हाथों में ही सिमटकर रह जाएगी?
दुनिया में रोटी का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रूस जब अपनी फसल की दरें तय करता है, तो उसकी गूंज एशिया से लेकर अफ्रीका तक सुनाई देती है। वैश्विक कृषि बाजार में वर्तमान में रूसी गेहूं की अंतरराष्ट्रीय निर्यात दर लगभग 230 से 240 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन के आसपास बनी हुई है। यदि रूसी घरेलू बाजार की बात करें तो स्थानीय मंडियों में यह दर लगभग 14,500 से 15,750 रूबल प्रति टन के आसपास दर्ज की जा रही है। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत निर्यात अकेले संभालने वाला यह देश सीधे तौर पर वैश्विक खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति की दिशा निर्धारित कर रहा है।
रूसी गेहूं उद्योग का इतिहास और बाजार पृष्ठभूमि
रूस का एक प्रमुख कृषि शक्ति के रूप में उभरना कोई अचानक हुई घटना नहीं है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस लंबे समय तक अनाज का आयात करने वाला देश बना रहा। हालांकि, सन 2000 के बाद सरकारी नीतियों में आए बदलाव, विशाल उपजाऊ भूमि और आधुनिक तकनीकों के समावेश ने तस्वीर पूरी तरह बदल दी। दक्षिण रूस के काला सागर और डॉन नदी के तटीय क्षेत्रों में स्थित 'चेर्नोज़म' यानी काली मिट्टी गेहूं की खेती के लिए दुनिया की सबसे उर्वर भूमियों में मानी जाती है।
पिछले एक दशक में रूस ने न केवल उत्पादन क्षमता को दोगुना किया, बल्कि अपने बुनियादी ढांचे और बंदरगाहों का भी व्यापक आधुनिकीकरण किया। वर्ष 2014 के बाद से लागू हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के जवाब में रूस ने खाद्य आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि रूस अमेरिका और कनाडा जैसे पारंपरिक बड़े निर्यातकों को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक बन गया। आज वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में कोई भी उतार-चढ़ाव सीधे मॉस्को की कृषि नीति और मौसम की परिस्थितियों से जुड़ा होता है।
रूस में गेहूं की कीमतें कैसे तय होती हैं: चरण-दर-चरण प्रक्रिया
रूस में गेहूं की कीमत केवल मांग और आपूर्ति का साधारण खेल नहीं है। इसके पीछे एक जटिल प्रक्रिया और सरकारी तंत्र काम करता है। नीचे दिए गए बिंदुओं से इसे आसानी से समझा जा सकता है:
1. उत्पादन लागत और क्षेत्रीय उपज: फसल सत्र की शुरुआत में ही नोवोरोसिस्क और रोस्तोव जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों में प्रति एकड़ उत्पादन लागत, उर्वरक के दाम और मौसम की स्थिति के आधार पर किसान का शुरुआती आधार मूल्य तय होता है।
2. घरेलू फ्लोटिंग एक्सपोर्ट टैक्स (दमिंग मैकेनिज्म): रूस सरकार अपने देश के भीतर रोटी और आटे के दामों को स्थिर रखने के लिए 'फ्लोटिंग एक्सपोर्ट ड्यूटी' प्रणाली का उपयोग करती है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम एक निश्चित सीमा (कट-ऑफ प्राइस) से ऊपर जाते हैं, तो सरकार प्रति टन पर निर्यात शुल्क बढ़ा देती है।
3. बंदरगाह तक परिवहन और लॉजिस्टिक्स: खेत से लेकर काला सागर (Black Sea) के बंदरगाहों तक गेहूं पहुंचाने के लिए ट्रेन और ट्रकों का भाड़ा जोड़ा जाता है। इस चरण को CPT (Carriage Paid To) मूल्य कहा जाता है।
4. एफओबी (Free on Board) निर्धारण: जब जहाज में गेहूं लाद दिया जाता है, तो उसमें बीमा, पोर्ट शुल्क और निर्यातक का मुनाफा जोड़कर अंतिम FOB दर घोषित की जाती है, जो वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय व्यापार का आधार बनती है।
केस स्टडी: मिस्र और अफ्रीकी देशों पर रूसी गेहूं दरों का सीधा प्रभाव
मिस्र दुनिया में गेहूं का सबसे बड़ा खरीदार है और उसकी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा काफी हद तक रूस पर निर्भर है। मिस्र की सरकारी खरीदार एजेंसी (GASC) जब भी गेहूं की बड़ी निविदा जारी करती है, तो रूसी निर्यातकों की बोलियां ही बाजार का रुझान तय करती हैं। हाल ही में जब रूस की कृषि एजेंसी ने अंतरराष्ट्रीय दामों के संदर्भ में न्यूनतम निर्यात मूल्य नीति को कड़ा किया और निर्यात कर में बदलाव किया, तो इसका असर सीधे मिस्र के बजट पर पड़ा।
जब रूस में गेहूं का FOB मूल्य 235 डॉलर प्रति टन पहुंचता है, तो मिस्र जैसे विकासशील देशों को अपनी सब्सिडी वाली रोटी प्रणाली (बालदी ब्रेड) को बनाए रखने के लिए अरबों डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। इसी तरह, पूर्वी अफ्रीका के तंजानिया और केन्या जैसे देशों ने रूसी गेहूं की खरीदारी में हाल के वर्षों में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की है। इस प्रकार, रोस्तोव की मंडी में गेहूं के भाव में होने वाला 5 डॉलर का उछाल भी अफ्रीकी उपमहाद्वीप में आम जनता की थाली और खाद्य महंगाई को सीधे प्रभावित करता है।
What experts say about it
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस में गेहूं की कीमत का वैश्विक कृषि बाजारों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। रूस दुनिया के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है, इसलिए वहाँ के घरेलू बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय जिंस (commodity) सूचकांकों को प्रभावित करते हैं। कृषि विश्लेषक यह भी रेखांकित करते हैं कि रूस में निर्यात कर (export tax), सरकारी नीतियां और मुद्रा की मजबूती जैसी आर्थिक स्थितियां स्थानीय किसानों और वैश्विक खरीदारों के बीच मूल्य संतुलन को तय करती हैं। इसके अलावा, बदलते मौसम के मिजाज और भू-राजनीतिक तनावों के बीच विशेषज्ञों का यह भी अनुमान है कि भविष्य में रूस की कृषि रणनीतियां और अधिक संवेदनशील हो सकती हैं, जिससे कीमतों में और अधिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: रूस में गेहूं की कीमत को कौन से मुख्य कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर: रूस में गेहूं की कीमतें मुख्य रूप से फसल के कुल उत्पादन, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग, सरकारी निर्यात नीतियों (जैसे निर्यात कर और कोटा), रूसी रूबल के मूल्य में उतार-चढ़ाव और परिवहन लागत पर निर्भर करती हैं। इसके अतिरिक्त, मौसम की स्थिति और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी कीमतों तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न 2: क्या रूस में गेहूं के दाम घटने से वैश्विक बाजारों पर असर पड़ता है?
उत्तर: हाँ, रूस द्वारा उत्पादित भारी मात्रा में गेहूं वैश्विक बाजार में सप्लाई किया जाता है। जब रूस में कीमतें घटती हैं या निर्यात बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी गेहूं सस्ता हो जाता है, जिससे दुनिया भर के आयातकों को राहत मिलती है और वैश्विक खाद्य मुद्रास्फीति नियंत्रित होने में मदद मिलती है।
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