श्रीलंका पर चीन का कुल कर्ज आधिकारिक आंकड़ों और वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार लगभग 7 अरब से 7.4 अरब अमेरिकी डॉलर के बीच है, जिसमें सरकारी द्विपक्षीय ऋण और चीनी वाणिज्यिक बैंकों की लेनदारियां दोनों शामिल हैं। यदि राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों (SOEs) को दिए गए अप्रत्यक्ष कर्जों और गारंटीकृत देनदारियों को भी जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा श्रीलंका के कुल बाहरी ऋण का लगभग 15 से 20 प्रतिशत बैठता है। साल 2022 में जब श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह खाली हो गया और देश ने खुद को डिफ़ॉल्ट घोषित किया, तब वैश्विक स्तर पर इस वित्तीय आपदा की मुख्य वजहों की पड़ताल शुरू हुई। यह केवल बुनियादी ढांचा खड़ा करने की लालसा नहीं थी, बल्कि बिना सोचे-समझे ली गई भयंकर रूप से महंगी उधारी और कुप्रबंधन का दर्दनाक नतीजा था।

आंकड़ों का जाल: चीन के श्रीलंका पर कुल कर्ज की असल तस्वीर

श्रीलंका के वित्त मंत्रालय और केंद्रीय बैंक के आधिकारिक आंकड़ों को खंगालने पर पता चलता है कि चीनी कर्ज का ढांचा बेहद उलझा हुआ और बहुस्तरीय है। सीधे तौर पर सरकारी द्विपक्षीय कर्ज (जो मुख्य रूप से Exim Bank of China से लिया गया) लगभग 4.95 अरब डॉलर है। इसके अलावा, चाइना डेवलपमेंट बैंक (CDB) जैसी संस्थाओं द्वारा दिए गए वाणिज्यिक टर्म लोन सुविधाएं लगभग 2.43 अरब डॉलर के आसपास हैं। इस प्रकार, केवल इन दो प्रमुख स्रोतों से ही प्रत्यक्ष लेनदारी 7.38 अरब डॉलर से अधिक हो जाती है। हालांकि, इसमें चीनी पीपुल्स बैंक द्वारा दिया गया 1.5 अरब डॉलर का विशेष करेंसी स्वैप और अन्य अप्रत्यक्ष व्यावसायिक क्रेडिट लाइन शामिल नहीं हैं।

पारंपरिक पेरिस क्लब के सदस्य देशों जैसे जापान या बहुपक्षीय वैश्विक संस्थाओं जैसे एशियाई विकास बैंक की तुलना में चीनी ऋण की शर्तें असाधारण रूप से कठोर थीं। उदाहरण के तौर पर, हम्बनटोटा बंदरगाह के निर्माण के लिए 2005 से 2013 के बीच लिए गए 1.34 अरब डॉलर से अधिक के ऋण पर 6.3 प्रतिशत तक की भारी ब्याज दर वसूली गई थी। कोलंबो पोर्ट सिटी, मट्टाला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और लोटस टॉवर जैसी विशालकाय परियोजनाओं में अंधाधुंध धन बहाया गया। इनमें से अधिकांश परियोजनाएं व्यावसायिक रूप से पूरी तरह से सफेद हाथी साबित हुईं और इनसे श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को कोई उल्लेखनीय राजस्व हासिल नहीं हुआ।

ऋण विकल्पों की तुलना: पेरिस क्लब बनाम चीनी विकास मॉडल

श्रीलंका के सामने अपने राष्ट्रीय अवसंरचना के विकास के लिए मुख्य रूप से दो अलग-अलग वित्तीय दृष्टिकोण मौजूद थे—पहला, पेरिस क्लब के सदस्य देशों (जैसे जापान) और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों (विश्व बैंक, एडीबी) का पारंपरिक रियायती ऋण मॉडल; और दूसरा, चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत मिलने वाला त्वरित वाणिज्यिक कर्ज। इन दोनों विकल्पों के तुलनात्मक विश्लेषण से साफ समझ आता है कि श्रीलंकाई नेतृत्व से कहां भारी भूल हुई।

विश्व बैंक या जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) से मिलने वाले ऋणों पर बेहद मामूली ब्याज दरें होती हैं (जो आमतौर पर 1 से 2 प्रतिशत से भी कम रहती हैं) और इन्हें चुकाने की अवधि 25 से 40 साल की होती है, जिसमें 10 साल तक का ग्रेस पीरियड मिलता है। इसके विपरीत, चीनी स्टेट-ओन्ड एंटरप्राइज और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से मिले कर्जों पर ब्याज दरें 4 से 6 प्रतिशत से अधिक थीं, और पुनर्भुगतान की समय-सीमा काफी कम रखी गई थी। चीन के मॉडल का सबसे आकर्षक पहलू यह था कि इसमें किसी भी प्रकार की पारदर्शी वित्तीय, पर्यावरणीय या मानवाधिकार जांच की आवश्यकता नहीं होती थी। तत्कालीन श्रीलंकाई राजनेताओं ने त्वरित राजनीतिक लाभ और बिना किसी कठिन शर्त के पैसा मिलने के चक्कर में चीनी वित्तपोषण को प्राथमिकता दी।

परिणाम यह हुआ कि जहां जापानी सहायता से बनी जल आपूर्ति या बुनियादी परिवहन परियोजनाएं धीरे-धीरे स्थिर आय पैदा करती रहीं, वहीं चीनी वाणिज्यिक ऋणों ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर अचानक बड़ा दबाव डाल दिया। अत्यधिक ब्याज दरों और कम परिपक्वता अवधि ने श्रीलंका के भुगतान संतुलन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया, जिससे देश को अंततः अपनी संप्रभुता को दांव पर लगाकर ऋण पुनर्गठन की मेज पर बैठना पड़ा।

एक चेतावनी भरा सबक: रणनीतिक चूक और ऋण जाल की त्रासदी

अविवेकपूर्ण, अपारदर्शी और महंगी उधारी किस तरह एक पूरे देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकती है, श्रीलंका इसका एक भयावह उदाहरण है। जब कोई राष्ट्र अपनी वास्तविक पुनर्भुगतान क्षमता का बिना आकलन किए उन परियोजनाओं में अरबों डॉलर झोंक देता है जो डॉलर में आय अर्जित नहीं कर सकतीं, तो आर्थिक बर्बादी निश्चित हो जाती है। वर्ष 2017 में जब श्रीलंका हम्बनटोटा बंदरगाह के लिए लिए गए चीनी कर्ज की किश्तें चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हो गया, तो उसे 1.1 अरब डॉलर के कर्ज राहत सौदे के तहत इस रणनीतिक बंदरगाह को 99 वर्षों के पट्टे पर चीनी सरकारी कंपनी को सौंपना पड़ा।

यह घटना साबित करती है कि जब वित्तीय व्यवहार्यता और आर्थिक उपयोगिता के बजाय केवल राजनीतिक लालच और भू-राजनीतिक हितों को तरजीह दी जाती है, तो देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 'ऋण जाल नीति' का शिकार हो जाता है। किसी भी विकासशील देश के लिए यह समझना अति आवश्यक है कि अवसंरचना के नाम पर लिया गया हर गैर-रियायती डॉलर भविष्य की पीढ़ियों के वित्तीय भविष्य को गिरवी रख देता है। अनुबंधों में अपारदर्शिता, छिपी हुई शर्तें और व्यावसायिक रूप से अव्यवहारिक परियोजनाओं के लिए अत्यधिक उधारी किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता को ताश के पत्तों की तरह ढहा सकती है। श्रीलंका की यह दुर्दशा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर और समय पर मिली चेतावनी है।

एक ऐसा अनसुना तथ्य जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं

श्रीलंका और चीन के बीच वित्तीय संबंधों को लेकर अक्सर सिर्फ बड़े पोर्ट, अरबों डॉलर के लोन और भारी-भरकम ब्याज दरों की ही चर्चा होती है। लेकिन एक बेहद अहम और कम चर्चित पहलू है 'घरेलू ऋण पुनर्गठन' (Domestic Debt Restructuring - DDR) और उसका आम जनता की गाढ़ी कमाई पर पड़ने वाला सीधा असर। जब श्रीलंका ने विदेशी कर्ज चुकाने में असमर्थता जताई, तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की शर्तों के तहत सरकार पर भारी दबाव बना कि वह विदेशी लेनदारों के साथ-साथ अपने ही देश के नागरिकों और संस्थानों के कर्ज का भी प्रबंधन करे। इसका मतलब यह हुआ कि जिन स्थानीय पेंशन फंडों, बैंकों और भविष्य निधि (Provident Funds) में आम श्रीलंकाई नागरिकों ने अपने जीवनभर की बचत जमा कर रखी थी, उनके रिटर्न में भारी कटौती की गई या ब्याज दरों को जबरन कम कर दिया गया।

इस तथ्य को बहुत कम लोग समझते हैं कि विदेशी भू-राजनीतिक ऋण संकट का सबसे बड़ा बोझ अंततः उस गरीब और मध्यम वर्गीय नागरिक पर पड़ता है, जिसका चीन के साथ सीधे तौर पर कोई लेन-देन नहीं था। श्रीलंका के मामले में, बाहरी कर्ज के कुप्रबंधन की कीमत देश के भीतर महंगाई, सामाजिक सुरक्षा में कटौती और पेंशनर्स की आय कम करके वसूली गई। यह एक ऐसा कड़वा सबक है जो यह सिखाता है कि जब कोई देश अपनी संप्रभुता को दांव पर लगाकर विदेशी महाशक्तियों से अंधाधुंध कर्ज लेता है, तो उसकी सजा वहां के मासूम नागरिकों को भुगतनी पड़ती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: क्या श्रीलंका चीन का कर्ज चुकाने में पूरी तरह विफल हो चुका है?

उत्तर: नहीं, श्रीलंका ने आधिकारिक तौर पर अपने विदेशी कर्ज के भुगतान को निलंबित (Default) जरूर किया था, लेकिन वर्तमान में वह चीन सहित अन्य लेनदारों के साथ कर्ज के पुनर्गठन (Debt Restructuring) पर बातचीत कर रहा है और नए समझौते कर रहा है।

प्रश्न 2: क्या हंबनटोटा बंदरगाह हमेशा के लिए चीन को बेच दिया गया है?

उत्तर: तकनीकी रूप से बंदरगाह बिका नहीं है, बल्कि कर्ज न चुका पाने की स्थिति में इसे 99 साल के पट्टे (Lease) पर चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंप दिया गया है, जिसे लेकर देश की संप्रभुता पर गंभीर सवाल उठे थे।

प्रश्न 3: क्या श्रीलंका के संकट से दूसरे विकासशील देशों को कोई सीख लेनी चाहिए?

उत्तर: बिल्कुल। विकासशील देशों को 'ऋण जाल कूटनीति' (Debt-Trap Diplomacy) के खतरों को समझते हुए बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए पारदर्शी, व्यवहार्य और संतुलित वित्तीय नीतियों को अपनाना चाहिए।

प्रश्न 4: श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कौन मदद कर रहा है?

उत्तर: वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), भारत और अन्य वैश्विक संस्थान श्रीलंका को वित्तीय सहायता और आर्थिक सुधार पैकेजों के जरिए उबारने का प्रयास कर रहे हैं।

निष्कर्ष और हमारी राय

श्रीलंका का चीन से कर्ज लेना और उसके बाद उपजा आर्थिक संकट केवल एक देश की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के विकासशील देशों के लिए एक चेतावनी है। अंधाधुंध विदेशी कर्ज और अदूरदर्शी नीतियां किसी भी देश को घुटनों पर ला सकती हैं। हमारी स्पष्ट राय है कि देशों को विदेशी मदद पर अत्यधिक निर्भरता खत्म करके आत्मनिर्भरता, पारदर्शिता और मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था पर जोर देना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी देश को अपनी संप्रभुता और जनता के अधिकारों का सौदा न करना पड़े।