संगीत की दुनिया में जब भी स्वरों की गहराई पर बात होती है, तो एक सवाल सदियों से विद्वानों को उलझाता रहा है—क्या संगीत के मूल में केवल सात स्वर हैं या इसके पीछे कोई और ही गणित छिपा है? भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से लेकर आधुनिक संगीतशास्त्र तक, श्रुतियों का यह रहस्य हमेशा से शोध का विषय रहा है। सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहें तो, एक सप्तक में कुल बाईस (22) श्रुतियां होती हैं, जो भारतीय संगीत पद्धति का आधार स्तंभ मानी जाती हैं।

श्रुतियों का ऐतिहासिक उद्गम और प्राचीन भारतीय संगीत परंपरा

भारतीय संगीत का इतिहास वेदों और प्राचीन ग्रंथों की ऋचाओं तक जाता है। वैदिक काल में सामगान के समय स्वरों के उतार-चढ़ाव को मापने के लिए एक अचूक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस हुई। यहीं से 'श्रुति' शब्द का जन्म हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ है—'वह जिसे सुना जा सके' या 'कानों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला नाद'। भरतमुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में बाईस श्रुतियों की इस परिकल्पना को वैज्ञानिक रूप दिया। उन्होंने इसके लिए एक प्रसिद्ध प्रयोग किया, जिसे 'सार्वकालिक प्रयोग' या दो वीणाओं का प्रयोग कहा जाता है। इस प्रयोग के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक सप्तक के भीतर नाद की अनगिनत सूक्ष्म परतें होती हैं, जिनमें से मुख्य रूप से बाईस श्रुतियों को छांटा गया। प्राचीन आचार्यों ने इन बाईस श्रुतियों को पांच जातियों—दीप्ता, आयता, करुणा, मृदु और मध्य में विभाजित किया। हर श्रुति की अपनी एक खास गूंज और भावनात्मक गहराई होती है, जो संगीत को केवल तकनीकी नहीं बल्कि आत्मीय बनाती है। मध्यकाल में संगीतकारों और ग्रंथकारों ने इन श्रुतियों के आधार पर ही आधुनिक शुद्ध और विकृत स्वरों के ताने-बाने को बुना, जिससे आज का शास्त्रीय संगीत अपनी समृद्ध अवस्था में पहुंचा है।

श्रुतियों से स्वरों की उत्पत्ति की क्रमिक प्रक्रिया

अब सवाल यह उठता है कि इन बाईस श्रुतियों से हमारे सात मूल स्वर कैसे बाहर आते हैं? इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए हमें नाद की सूक्ष्म गणितीय यात्रा को देखना होगा। संगीत में कोई भी स्वर अचानक हवा से प्रकट नहीं होता, बल्कि वह एक निश्चित श्रुति अंतराल के बाद अपनी जगह बनाता है। जब हम सप्तक की शुरुआत करते हैं, तो पहली श्रुति से लेकर अंतिम बाईसवीं श्रुति तक नाद की एक निरंतर धारा बहती है। सप्तक के सात स्वर—सा, रे, ग, म, प, ध, नि—इन्हीं बाईस श्रुतियों के अलग-अलग पायदानों पर स्थापित किए गए हैं। भरतमुनि के समय में यह पैमाना तय हुआ कि कौन सा स्वर किस श्रुति पर बैठेगा। उदाहरण के लिए, 'षडज' (सा) चौथी श्रुति पर, 'ऋषभ' (रे) सातवीं श्रुति पर, 'गंधार' (ग) नौवीं श्रुति पर स्थापित होता है। इसी प्रकार म, प, ध और नि के लिए भी श्रुतियों का एक निश्चित गणितीय अंतराल तय किया गया। आधुनिक काल में पंडित भातखंडे और अन्य संगीत शास्त्रियों ने इन अंतरालों को और अधिक सरल बनाया, ताकि सीखने वाले छात्र इसे आसानी से समझ सकें। हर स्वर के बीच की यह दूरी ही तय करती है कि राग का मिजाज कैसा होगा और वह श्रोता के मन पर कैसा असर छोड़ेगा।

व्यवहारिक उदाहरण: रागों में श्रुतियों का जीवंत प्रयोग

तात्त्विक बातों को छोड़कर अगर हम वास्तविक संगीत की जमीन पर उतरें, तो इन बाईस श्रुतियों का जादू हर महान कलाकार की बंदिश में साफ महसूस होता है। जब कोई सिद्धहस्त गायक राग दरबारी या राग तोड़ी गाता है, तो वह केवल सात स्वरों को नहीं छूता, बल्कि उन स्वरों के बीच की छिपी हुई श्रुतियों को आंदलित करता है। मान लीजिए, कोई कलाकार शुद्ध गंधार से कोमल गंधार की तरफ मुड़ता है; उस सूक्ष्म संक्रमण (transition) के दौरान वह कई ऐसी अदृश्य श्रुतियों को छू लेता है जो कागजों पर नहीं लिखी जातीं, बल्कि केवल गुरुमुख से सीखी जाती हैं। इसे ही संगीत की भाषा में आंदोलन या गमक कहा जाता है। उस्ताद अब्दुल करीम खान या पंडित भीमसेन जोशी जब गाते थे, तो उनके स्वर किसी सीधी रेखा की तरह नहीं चलते थे, बल्कि वे श्रुतियों के समंदर में तैरते हुए प्रतीत होते थे। यही वजह है कि एक ही राग को दो अलग-अलग घराने के उस्ताद गाते हैं, तो दोनों का प्रभाव अलग होता है—क्योंकि उनके श्रुतियों को छूने का अंदाज और उनकी सूक्ष्म समझ अलग होती है।

What experts say about it

भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों और ग्रंथकारों का मानना है कि एक सप्तक में कुल बाईस (22) सूक्ष्म और स्पष्ट रूप से सुनी जा सकने वाली ध्वनियां या श्रुतियां होती हैं। प्राचीन ग्रंथ 'संगीत रत्नाकर' और भरत मुनि के 'नाट्यशास्त्र' में भी इसी संख्या को आधार मानकर संगीत की पूरी रचना का ताना-बाना बुना गया है। संगीत विशेषज्ञों के अनुसार, ये बाईस श्रुतियां केवल सैद्धांतिक आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह संगीत की वह आधारशिला हैं जिन पर सा, रे, ग, म, प, ध, नि जैसे सात शुद्ध और पांच विकृत स्वर अपनी निश्चित दूरियों पर स्थापित होते हैं। आधुनिक और प्राचीन दोनों ही पद्धतियों में इस बात पर पूर्ण सहमति है कि श्रुतियों के बिना किसी भी स्वर का सही और सटीक उच्चारण संभव ही नहीं है। संगीत वैज्ञानिक यह भी तर्क देते हैं कि हर एक श्रुति नाद का ही एक विशिष्ट और परिष्कृत रूप है, जो कान को बेहद प्रिय और आनंददायक महसूस होता है। यही वजह है कि शास्त्रीय संगीत की गहराइयों को समझने के लिए इन बाईस श्रुतियों के सूक्ष्म अंतर को पहचानना किसी भी संगीतज्ञ के लिए सबसे पहली और जरूरी शर्त मानी जाती है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या एक सप्तक की सभी बाईस श्रुतियों का प्रत्यक्ष रूप से गायन-वादन में प्रयोग किया जाता है?
उत्तर: नहीं, एक सप्तक के अंतर्गत कुल 22 श्रुतियां अवश्य होती हैं, लेकिन व्यावहारिक गायन और वादन में मुख्य तौर पर केवल 12 स्वरों (7 शुद्ध और 5 विकृत) का ही सीधा इस्तेमाल किया जाता है। ये 12 स्वर उन्हीं 22 श्रुतियों के विशिष्ट और तय किए गए स्थानों से चुने जाते हैं ताकि सुरों की शुद्धता और मधुरता बरकरार रह सके।

प्रश्न 2: श्रुति और स्वर में मुख्य अंतर क्या होता है?
उत्तर: श्रुति वह सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनि है जिसे कान आसानी से सुन और आपस में अलग पहचान सकते हैं, जबकि स्वर उन्हीं 22 श्रुतियों में से चुने गए वे निश्चित और मधुर बिंदु हैं जिन पर रुककर संगीत की रचना की जाती है। सरल शब्दों में कहें तो हर स्वर एक श्रुति होता है, लेकिन हर श्रुति को मुख्य स्वर का दर्जा नहीं दिया जाता है।

क्या आधुनिक युग की मशीनी और डिजिटल धुनों के इस दौर में, जहाँ कान केवल तय किए गए 12 स्वरों के आदी हो चुके हैं, क्या कोई आम संगीतप्रेमी कभी उन 22 सूक्ष्म श्रुतियों के असली और गहरे रस को महसूस कर पाएगा?