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संगीत की दुनिया में जब हम उतरते हैं, तो हर एक सुर के पीछे सदियों का इतिहास और गणित छिपा होता है। क्या आप जानते हैं कि हमारे सात शुद्ध स्वर किसी जादुई झटके से पैदा नहीं हुए, बल्कि उनके पीछे एक बेहद बारीक वैज्ञानिक और गणितीय प्रक्रिया काम करती है जिसे श्रुति स्वर विभाजन कहा जाता है। यह संगीत का वह सूक्ष्म ढांचा है जिस पर संपूर्ण भारतीय शास्त्रीय संगीत की भव्य इमारत टिकी हुई है। आइए इस प्राचीन और रहस्यमयी गणितीय कला के तह तक चलते हैं।
श्रुति और स्वर की उत्पत्ति का ऐतिहासिक सफर
प्राचीन काल में संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि यह प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ जुड़ने का एक माध्यम था। वैदिक युग से लेकर मध्यकाल तक, संगीतज्ञों ने ध्वनि की गहराइयों को मापने के लिए अथक प्रयास किए। 'श्रुति' शब्द उस न्यूनतम सुनाई देने वाली ध्वनि को कहते हैं जिसे मानव कान आसानी से पहचान सके और दो अलग ध्वनियों के बीच का अंतर स्पष्ट हो सके। भरत मुनि ने अपने महान ग्रंथ नाट्यशास्त्र में बाकायदा प्रयोग करके यह साबित किया था कि संगीत की पूरी व्यवस्था बासुकी या चक्र के नियमों पर आधारित नहीं, बल्कि ध्वनि तरंगों के प्राकृतिक विभाजन पर टिकी है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि हमारे प्राचीन आचार्यों ने अच्चल और चल स्वरों की स्थापना के लिए एक ऑक्टेव यानी सप्तक के भीतर बाइस श्रुतियों की कल्पना की। इन बाइस श्रुतियों को अलग-अलग विद्वानों ने अपने ढंग से परिभाषित किया। अहोबल और लोचन जैसे संगीतशास्त्रियों ने वीणा के तारों की लंबाई को मापकर यह दिखाया कि कैसे एक ही तार को अलग-अलग बिंदुओं पर कसने या ढीला करने से अलग-अलग श्रुतियाँ उत्पन्न होती हैं। यह सफर ध्वनि की भौतिकी और संगीत के सौंदर्यशास्त्र का एक अद्भुत संगम है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक और लिखित परंपराओं के जरिए हम तक पहुँचा है।
बांसुरी और वीणा पर आधारित चरण-दर-चरण श्रुति विभाजन प्रक्रिया
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह विभाजन काम कैसे करता है और इसे प्रायोगिक तौर पर कैसे समझा जा सकता है? संगीत की इस जटिल प्रक्रिया को समझने के लिए हमें एक निश्चित क्रम या चरण का पालन करना होता है। सबसे पहले, एक मानक आधार स्वर यानी 'षडज' को तय किया जाता है जिसे संगीत की भाषा में 'सा' कहा जाता है। यह आधार स्वर किसी भी राग या रचना की रीढ़ की हड्डी होता है और इसी के सापेक्ष बाकी के स्वरों की स्थिति तय की जाती है.
दूसरे चरण में, सप्तक की कुल बाइस श्रुतियों को वैज्ञानिक विधि से अलग-अलग स्थानों पर वितरित किया जाता है। प्राचीन संगीतकारों ने प्रयोग के तौर पर दो एक जैसी वीणाएं लीं—एक को स्थिर रखा और दूसरी के तारों की लंबाई में बदलाव किया। जब तार की लंबाई को गणितीय अनुपातों में काटा गया, तो यह स्पष्ट हो गया कि कौन सी श्रुति किस स्वर के अंतर्गत आएगी। उदाहरण के लिए, यदि हम 'सा' से आगे बढ़ें, तो पहली चार श्रुतियों को पार करने के बाद हमें अगला महत्वपूर्ण स्वर प्राप्त होता है।
तीसरे चरण में इन श्रुतियों का स्वरों के साथ सटीक मिलान किया जाता है। भरत मुनि के समय से ही यह तय माना गया कि सा, ग, म, प, ध, नि अपने नियत स्थानों पर कैसे बैठेंगे। आधुनिक पद्धति में हम बारह स्वरों (सात शुद्ध और पाँच विकृत) का प्रयोग करते हैं, जो असल में उन्हीं बाइस श्रुतियों के बीच की निश्चित दूरियों या अंतरालों का परिणाम हैं। हर स्वर के हिस्से में आने वाली श्रुतियों की संख्या अलग होती है—जैसे किसी स्वर को चार श्रुतियाँ मिलती हैं, तो किसी को तीन और किसी को दो।
एक जीवंत उदाहरण: राग यमन के माध्यम से श्रुति का सूक्ष्म सौंदर्य
इस पूरी प्रक्रिया को असल जीवन के एक उदाहरण से समझना सबसे आसान है। मान लीजिए कि आप शाम के वक्त अपने कमरे में बैठे हैं और तानपुरा बज रहा है। तानपुरे के लगातार गूंजते 'सा' और 'प' के स्वरों के बीच हवा में एक अदृश्य ऊर्जा तैरती रहती है। अब यदि एक शास्त्रीय गायक 'राग यमन' गाना शुरू करता है, तो उसका गंधार यानी 'रे' से 'ग' की तरफ जाने का अंदाज बेहद खास होता है।
जब गायक शुद्ध गंधार की बजाय तीव्र मध्यम या कोमल गंधार की तरफ मुड़ता है, तो वह सीधे तौर पर एक श्रुति से दूसरी श्रुति पर छलांग नहीं लगाता, बल्कि बीच की सूक्ष्म श्रुतियों को छूते हुए गुजरता है। यही कारण है कि एक ही स्वर को गाने के दो अलग कलाकारों के तरीके में जमीन-आसमान का फर्क महसूस होता है। श्रुति का यह सूक्ष्म विभाजन ही वह जादू है जो एक साधारण धुन को रोंगटे खड़े कर देने वाले शास्त्रीय अनुभव में बदल देता है।
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