मानव इतिहास के प्रत्येक कालखंड में आकाश की अनंत ऊंचाइयों और समुद्र की अथाह गहराइयों को निहारते हुए यह प्रश्न मनुष्य के मन में बार-बार गूंजा है कि आखिर इस समस्त ब्रह्मांड का संचालक कौन है। विज्ञान आज भले ही ब्रह्मांड के आरंभ और क्वांटम भौतिकी के रहस्यों को सुलझाने का दावा करे, परंतु अस्तित्व की इस विशालता के आगे हर बुद्धि नतमस्तक हो जाती है। परमेश्वर से बड़ा इस संपूर्ण चराचर जगत में न कोई हुआ है और न कभी हो सकता है, क्योंकि वही हर एक जीव के भीतर प्राण और संपूर्ण ऊर्जा का एकमात्र मूल स्त्रोत है।

सनातन दर्शन और इतिहास के पन्नों में छिपे परमेश्वर की महत्ता के मूल स्रोत

प्राचीन काल से ही मानव ने जब अपनी सीमाओं का अनुभव किया, तब उसने किसी सर्वशक्तिमान सत्ता की परिकल्पना की जो इस सृष्टि को नियंत्रित करती है। वेदों, उपनिषदों और दुनिया भर के प्राचीन ग्रंथों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि यह दृश्यमान जगत एक महाशक्ति के आधीन गतिमान है। ऋषियों और मुनियों ने सदियों पहले गहन ध्यान और तपस्या के माध्यम से यह अनुभव किया था कि जिसे हम परमेश्वर कहते हैं, वह केवल कोई व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि एक असीम चेतना है जो कण-कण में रमी हुई है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े सम्राटों और बलशाली योद्धाओं ने खुद को सर्वसर्वा साबित करने की कोशिश की, परंतु काल के थपेड़ों ने उनके अहंकार को धूल में मिला दिया और केवल उस परम शक्ति का ही वर्चस्व बाकी रहा।

ब्रह्मांडीय नियमों और प्राकृतिक शक्तियों के संचालन की अद्भुत सूक्ष्म प्रक्रिया

इस पूरी व्यवस्था का संचालन किसी अदृश्य और अत्यंत सटीक नियंत्रण प्रणाली के तहत होता है जिसे समझना मानवीय बुद्धि के लिए एक जटिल पहेली जैसा है। सबसे पहले, ब्रह्मांड में अरबों आकाशगंगाएं एक निश्चित नियम और गति से निरंतर घूमती रहती हैं, जहां गुरुत्वाकर्षण और अन्य मौलिक बल बिना किसी त्रुटि के संतुलन बनाए रखते हैं। दूसरे चरण में, पृथ्वी जैसे विशिष्ट गृह पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिसमें सूर्य की सही दूरी, वायुमंडल की परतें और जल चक्र का सटीक प्रबंधन शामिल है। तीसरे चरण में, प्रकृति के भीतर जीवन का यह चक्र बीच से पौधे और पौधे से विशाल वृक्ष तथा जीवों के रूप में आगे बढ़ता है, जिसमें हर एक जीव को जीवित रहने के लिए एक निश्चित जैविक घड़ी और सहज बुद्धि प्रदान की जाती है। अंततः, इस पूरी जटिल श्रृंखला में ऊर्जा का रूपांतरण इस प्रकार होता है कि एक भी अणु नष्ट नहीं होता, और यही सतत प्रबंधन उस सर्वोच्च सत्ता की उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो हर एक प्रक्रिया को सूक्ष्म से लेकर विराट स्तर पर नियंत्रित करती है.

जीवन की एक वास्तविक और प्रेरणादायक गाथा जो इस सर्वोच्च सत्य को उजागर करती है

एक बार एक अत्यंत प्रसिद्ध वैज्ञानिक, जिन्होंने अपना पूरा जीवन ब्रह्मांड के नियमों को गणितीय सूत्रों में बांधने में बिता दिया था, एक भयंकर प्राकृतिक आपदा का शिकार होने से बाल-बाल बचे। जब वे अपनी प्रयोगशाला में बैठे थे, तब एक भयंकर भूकंप ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया, लेकिन उनकी टेबल के ठीक ऊपर रखी एक नाजुक कांच की वस्तु पूरी तरह सुरक्षित बच गई, जबकि आसपास के मजबूत कंक्रीट के खंभे तक टूट गए थे। उस घटना ने उस तर्कवादी वैज्ञानिक के अहंकार को झकझोर कर रख दिया और उन्हें यह अहसास हुआ कि मानवीय ज्ञान और मशीनें चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाएं, इस प्रकृति और ब्रह्मांड में एक ऐसी अदृश्य और सर्वोच्च शक्ति अवश्य कार्य कर रही है जो हर भौतिक नियम से परे है। उस दिन से उन्होंने यह स्वीकार किया कि विज्ञान केवल यह बताता है कि चीजें कैसे काम करती हैं, लेकिन उनके पीछे की मूल शक्ति और परमेश्वर की महानता वह रहस्य है जिसके आगे हर बड़ा अनुसंधान अधूरा पड़ जाता है।