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स्पष्ट शब्दों में कहें तो, नहीं, पवित्र नदी गंगा का एक भी कतरा पाकिस्तान की जमीन को नहीं छूता है। यह दक्षिण एशिया की उन महान नदियों में शुमार है जो भारत और बांग्लादेश के भू-भाग से होकर अपना सफर तय करती हैं, जबकि इसका पाकिस्तान के नदी तंत्र से भौगोलिक रूप से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। इसके बावजूद, सीमा पार के कुछ हलकों और अनभिज्ञ लोगों के मन में इस भौगोलिक तथ्य को लेकर अक्सर गफलत बनी रहती है। इस भ्रांति के मूल कारणों, उपमहाद्वीप के जटिल जल-प्रवाह मानचित्र और राजनीतिक सरहदों की वास्तविकताओं को गहराई से समझना बेहद जरूरी हो जाता है ताकि इस विषय पर फैली तमाम गलतफहमियों का हमेशा के लिए खात्मा किया जा सके।
भारतीय उपमहाद्वीप का भू-आकृतिक ढांचा और नदी प्रणालियों का भौगोलिक विन्यास
एशिया महाद्वीप के इस हिस्से की भौगोलिक संरचना को अगर आप गौर से देखें, तो यह साफ नजर आएगा कि नदियां किसी इंसानी सरहद या सियासी लकीर को देखकर नहीं बहतीं, बल्कि वे ढलान और प्रकृति के नियमों पर चलती हैं। उत्तराखंड के गंगोत्री हिमनद से निकलने वाली गंगा जब मैदानों का रुख करती है, तो इसका सफर पूरी तरह से भारत की भूमि पर होता है। इसके समानांतर, पश्चिम की ओर बहने वाली सिंधु नदी प्रणाली का अधिकांश हिस्सा आज के पाकिस्तान में प्रवाहित होता है, जिसकी अपनी पांच सहायक नदियां यानी झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास और सतलुज हैं। सिंधु बेसिन और गंगा बेसिन के बीच की यह जल विभाजक रेखा भौगोलिक रूप से इतनी स्पष्ट है कि दोनों नदियों का पानी कभी आपस में प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता। भारत के भीतर ही यमुना, सोन, और कोसी जैसी विशाल जलधाराएं इसमें मिलकर इसके विस्तार को और विराट बनाती हैं। आगे चलकर यह जलराशि बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां इसे पद्मा के नाम से जाना जाता है और अंततः यह बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है। इस पूरे भौगोलिक सफर में पाकिस्तान का दूर-दूर तक कोई छोर नहीं आता, क्योंकि वह भारत के पश्चिम में स्थित है जबकि गंगा भारतीय उपमहाद्वीप के मध्य और पूर्वी हिस्से का सीना चीरती हुई बहती है।
ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में जल प्रबंधन की वास्तविकियतें
आजादी के बाद जब भारत और पाकिस्तान का भूगोल बदला, तो दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर कई गंभीर समझौते हुए। वर्ष 1960 में हुई सिंधु जल संधि इसका सबसे बड़ा और प्रासंगिक उदाहरण है, जिसके तहत सिंधु नदी प्रणाली के पानी का नियंत्रण तय किया गया था। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस संधि का दायरा केवल और केवल पश्चिमी नदियों यानी सिंधु, झेलम और चेनाब तथा पूर्वी नदियों यानी रावी, ब्यास और सतलुज तक ही सीमित था। इस ऐतिहासिक समझौते में गंगा नदी का दूर-दूर तक कोई जिक्र नहीं था, क्योंकि गंगा बेसिन का पाकिस्तान की भौगोलिक सीमा से कोई भौगोलिक या सामरिक सरोकार ही नहीं है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक और रणनीतिकार जब उपमहाद्वीप के जल कूटनीति पर चर्चा करते हैं, तो वे अक्सर भारत और बांग्लादेश के बीच के गंगा जल समझौते का जिक्र करते हैं, जिसे वर्ष 1996 में फक्का बैराज के संदर्भ में अंतिम रूप दिया गया था। इस अंतरराष्ट्रीय जल समझौते का मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि शुष्क मौसम के दौरान भी बांग्लादेश को उसके हिस्से का पर्याप्त पानी मिलता रहे। पाकिस्तान के कुछ मीडिया मंचों या अज्ञानतावश कई बार दोनों जल समझौतों को आपस में गड्ड-मड्ड कर दिया जाता है, जिससे आम जनता के मन में यह भ्रम पैदा होता है कि शायद गंगा का पानी भी पाकिस्तान की तरफ जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कोसों दूर है।
व्याहारिक निहितार्थ और जल सुरक्षा के समकालीन आयाम
आज के दौर में जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर चुनौतियां पूरी दुनिया के सामने मुंह बाए खड़ी हैं, तब नदियों का संरक्षण और उनका सही प्रबंधन किसी भी राष्ट्र के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है। भारत के भीतर गंगा बेसिन करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि और सांस्कृतिक पहचान का मुख्य आधार है। यदि भौगोलिक सच्चाइयों से परे जाकर पाकिस्तान के साथ जल बंटवारे की काल्पनिक चर्चाओं को हवा दी जाती है, तो इससे केवल वैचारिक भ्रम फैलता है और वास्तविक पर्यावरणीय संकटों से ध्यान भटकता है। हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार, मानसूनी हवाओं के बदलते मिजाज और भूजल स्तर में भारी गिरावट जैसी समकालीन समस्याएं आज गंगा घाटी के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ठोस क्षेत्रीय नीतियों की आवश्यकता है, न कि किसी भू-राजनीतिक मिथक को पालने की। जब तक हम अपनी पाठ्यपुस्तकों और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट नहीं रखेंगे कि कौन सी नदी किस देश के किस हिस्से से गुजरती है, तब तक जल सुरक्षा और संरक्षण जैसे गंभीर मुद्दों पर पारदर्शी संवाद स्थापित करना नामुमकिन होगा। इसलिए, गंगा के प्रवाह मार्ग को लेकर किसी भी प्रकार के संशय को पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए क्योंकि प्रकृति ने इसके भाग्य को भारत और बांग्लादेश की माटी के साथ ही हमेशा के लिए बांध दिया है।
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