उत्तर प्रदेश की भूमि को सींचने वाली मुख्य और सहायक नदियों का कुल आंकड़ा लगभग इकतीस से बत्तीस प्रमुख जलधाराओं के इर्द-गिर्द घूमता है, जिनमें गंगा और यमुना जैसी महाकाय नदियां इस संपूर्ण भौगोलिक तंत्र की रीढ़ मानी जाती हैं। भारत के इस घनी आबादी वाले सूबे में उत्तर से दक्षिण तक फैली विस्तृत जल प्रणालियां न केवल कृषि की दिशा तय करती हैं, बल्कि इसकी ऐतिहासिक संस्कृति को भी निरंतर जीवंत रखती हैं। इस अनूठे प्रवाह तंत्र का सही आकलन करने के लिए हमें इसकी भौगोलिक बनावट, ढलान और बारहमासी तथा मौसमी स्रोतों के अंतर को बेहद बारीक नजर से समझना होगा।

उत्तर प्रदेश के जल तंत्र के मुख्य आंकड़े और प्रवाह से जुड़े आंकड़े

राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल को अगर जल संसाधनों के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यहां हिमालयी और प्रायद्वीपीय दोनों प्रकार की नदियां अपना योगदान देती हैं। आधिकारिक और भू-वैज्ञानिक दस्तावेजों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के भीतर छोटी-बड़ी मिलाकर लगभग 31 से 35 ऐसी मुख्य धाराएं हैं जिन्हें स्वतंत्र नदी प्रणालियों के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनमें से गंगा राज्य से होकर गुजरने वाली सबसे लंबी नदी है, जिसकी कुल लंबाई 2525 किलोमीटर है और इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इस राज्य की सीमा के भीतर तय होता है। यमुना राज्य की दूसरी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण नदी है, जो लगभग 1376 किलोमीटर की कुल यात्रा के बाद प्रयागराज में गंगा से मिलती है। इसके अलावा घाघरा, गोमती, चंबल, बेतवा, केन, राप्ती और सोन जैसी नदियां इस क्षेत्र की जल संपदा को मजबूत करती हैं। गोमती नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले की फुलहर झील से होता है, जो इसे पूरी तरह से मैदानी इलाकों में जन्म लेने वाली एक प्रमुख नदी बनाता है। इन सभी जलधाराओं का कुल वार्षिक डिस्चार्ज और इनकी सहायक उपनदियां मिलकर उत्तर प्रदेश को देश के सबसे समृद्ध जलीय मैदानों में शुमार करती हैं, जहां सिंचाई का एक विशाल नेटवर्क फैला हुआ है।

हिमालयी बारहमासी और दक्षिणी पठारी मौसमी नदियों की तुलना

उत्तर प्रदेश की नदियों को मुख्य रूप से दो अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जाता है, जिनके स्वभाव और उद्गम में जमीन-आसमान का अंतर है। पहली श्रेणी में हिमालय से निकलने वाली बारहमासी नदियां आती हैं, जिनमें गंगा, यमुना, घाघरा, शारदा, राप्ती और रामगंगा शामिल हैं। ये नदियां ग्लेशियरों के पिघलने और मानसूनी वर्षा दोनों से जल प्राप्त करती हैं, जिसके कारण भीषण गर्मी के महीनों में भी इनमें पानी का प्रवाह निरंतर बना रहता है। इन नदियों का तल अपेक्षाकृत चौड़ा होता है और ये उत्तर भारत के मैदानी भागों में व्यापक उपजाऊ मिट्टी यानी जलोढ़ मैदान का निर्माण करती हैं। इसके विपरीत, दूसरी श्रेणी में दक्षिण के प्रायद्वीपीय पठार और विंध्य पर्वतमाला से निकलने वाली नदियां आती हैं, जैसे चंबल, बेतवा, केन, सोन और टोंस। ये नदियां पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती हैं, जिसकी वजह से इन्हें मौसमी या अनित्य नदियां कहा जाता है। गर्मियों के मौसम में इन दक्षिणी नदियों का जलस्तर तेजी से गिर जाता है और कई बार ये सूखने की कगार पर पहुंच जाती हैं। भौगोलिक रूप से, जहां हिमालयी नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहकर मैदानी इलाकों को समृद्ध करती हैं, वहीं पठारी नदियां दक्षिण के ऊबड़-खाबड़ इलाकों और बुंदेलखंड जैसी पथरीली जमीन से उठकर उत्तर की मुख्य नदियों में समा जाती हैं। इस अंतर को समझे बिना राज्य के कृषि नियोजन या जल प्रबंधन को पूरी तरह से समझ पाना असंभव है।

नदी प्रणालियों की अनदेखी और अति-दोहन के गंभीर परिणाम

प्राकृतिक जल स्रोतों की यह प्रचुरता अपने साथ कुछ गहरे खतरे भी लेकर आती है, यदि इनके संरक्षण और प्रबंधन में थोड़ी सी भी ढिलाई बरती जाए। अनियंत्रित दोहन, औद्योगिक कचरे का सीधा निस्तारण और शहरीकरण के दबाव ने उत्तर प्रदेश की कई महत्वपूर्ण नदियों की पारिस्थितिकी को गंभीर संकट में डाल दिया है। गोमती और वरुणा जैसी नदियां अपने शहरी प्रवाह क्षेत्रों में अत्यधिक प्रदूषण के कारण भारी दबाव झेल रही हैं, जिससे उनका स्वाभाविक जैविक जीवन नष्ट होने की कगार पर पहुंच गया है। इसके अलावा, हिमालयी नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में जंगलों की बेतरतीब कटाई के कारण मानसूनी महीनों में अचानक विकराल बाढ़ आने का खतरा हर साल बढ़ जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिले हर साल राप्ती और घाघरा जैसी नदियों की उग्र बाढ़ के कारण भारी तबाही का सामना करते हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगता है। दूसरी तरफ, बुंदेलखंड क्षेत्र की पठारी नदियां गर्मियों में पूरी तरह सूख जाने के कारण पेयजल और सिंचाई के भीषण संकट को जन्म देती हैं, जिससे वहां के किसानों को गहरी लाचारी का सामना करना पड़ता है। यदि समय रहते इन जलमार्गों के प्राकृतिक प्रवाह को संरक्षित नहीं किया गया और भूजल के अत्यधिक दोहन पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाले दशकों में यह समृद्ध नदी तंत्र अपनी जीवंतता खो सकता है।