दुनिया में कितने कुरान हैं? एक ऐतिहासिक और तथ्यात्मक विश्लेषण (भाग-1)
जब कभी दुनिया के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों और उनके इतिहास की चर्चा होती है, तो इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान (Quran) के संकलन और स्वरूप को लेकर कई तरह के सवाल और जिज्ञासाएं सामने आती हैं। आम तौर पर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि "दुनिया में कुल कितने कुरान हैं?" या क्या इसके अलग-अलग संस्करण (Versions) मौजूद हैं?
1. मूल और बुनियादी सच्चाई: कुरान की संख्या
इस्लामी इतिहास, धर्मशास्त्र और अकादमिक शोध के अनुसार, पूरी दुनिया में कुरान का केवल एक ही मूल ग्रंथ है।
इसमें किसी भी प्रकार के विरोधाभासी या अलग संस्करण नहीं पाए जाते।
दुनिया के किसी भी कोने में छपी हो या प्राचीन से प्राचीन पांडुलिपि (Manuscript) हो, कुरान के अध्यायों (सूरतों) की संख्या 114 और इसके कुल ३० हिस्से (पारे) सर्वत्र समान हैं।
इसकी मूल अरबी भाषा और उसका पाठ चौदह सौ वर्षों से एक जैसी ही संरक्षा के साथ चला आ रहा है।
2. 'अह्रुफ' और 'किरात' का संज्ञान: भिन्नता का भ्रम क्यों होता है?
कई बार लोग विभिन्न लिपियों, मुद्रण या पढ़ने के तरीकों को देखकर यह समझ बैठते हैं कि दुनिया में कई तरह की कुरानें हैं। इस असमंजस के पीछे मुख्य रूप से दो ऐतिहासिक और भाषाई पहलू हैं:
सात अह्रुफ (Seven Ahruf):
शुरुआती दौर में अलग-अलग अरब कबीलों की बोलियों और उच्चारण की आसानी के लिए पैगंबर मुहम्मद के समय इसे अलग-अलग लहजों (Seven Dialects/Modes) में पढ़ने की अनुमति दी गई थी। इसका उद्देश्य पाठ को सरल बनाना था, न कि मूल संदेश या शब्दों को बदलना। दस किरात (Ten Qira'at):
यह कुरान के शब्दों को पढ़ने या उच्चारण करने की भिन्न पद्धतियाँ (Recitation Styles) हैं। उदाहरण के लिए, दुनिया के एक बड़े हिस्से में 'हाफ्स अन आसिम' (Hafs 'an 'Asim) शैली से कुरान पढ़ी जाती है, तो उत्तरी अफ्रीका में 'वरश अन नाफे' (Warsh an Nafi') शैली प्रचलित है। महत्वपूर्ण बिंदु:
ये सभी पद्धतियाँ केवल उच्चारण, स्वर की लंबाई या लहजे से जुड़ी हैं। इनसे कुरान के मूल अर्थ, उसकी आयतों या उसके theological संदेश में कोई बदलाव नहीं आता।
3. ऐतिहासिक संकलन: उस्मानी नुस्खा (The Uthmanic Codex)
इतिहास इस बात की गवाही देता है कि पैगंबर मुहम्मद के जीवनकाल के दौरान कुरान के अंश ताड़ के पत्तों, चमड़े और हड्डियों पर लिखे हुए सुरक्षित थे। उनके वफात (निधन) के बाद, पहले खलीफा हज़रत अबू बकर के कार्यकाल में इन्हें एक ग्रंथ के रूप में संकलित किया गया।
इसके पश्चात, तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान के दौर में जब इस्लाम का दायरा अरब से बाहर फारस और रोम तक फैल गया, तब उच्चारण की भिन्नता को दूर करने के लिए उस्मानी मानक के तहत कुरान की आधिकारिक प्रतियाँ तैयार करवाकर अलग-अलग राज्यों में भेजी गईं। आज भी दुनिया भर में उसी मूल मानक का अनुसरण किया जाता है।
मुख्य निष्कर्ष: दुनिया भर में मुसलमानों द्वारा पढ़ी जाने वाली कुरान एक ही है। मुद्रण शैली या पढ़ने के लहजों (किरात) में अंतर को कोई अलग संस्करण नहीं कहा जा सकता।
क्या आप इस लेख के अगले भाग में प्राचीन कुरान की उन ऐतिहासिक पांडुलिपियों के बारे में जानना चाहते हैं जो आज भी दुनिया के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं?
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