कोहिनूर हीरा भारत कौन लाया? – एक ऐतिहासिक रहस्य
दुनिया के सबसे चर्चित, बेशकीमती और रहस्यमयी हीरों में शुमार कोहिनूर हीरा (Koh-i-Noor Diamond) हमेशा से ही इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।
कोहिनूर का प्राकट्य और आंध्र प्रदेश की गोलकुंडा खदानें
कोहिनूर के शुरुआती इतिहास को लेकर कई पौराणिक और ऐतिहासिक मतभेद हैं, लेकिन अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि यह हीरा दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध गोलकुंडा खदानों (विशेषकर कोल्लर खदान) से निकला था।
प्राचीन उल्लेख: कई प्राचीन कथाओं में इसे 'स्यमंतक मणि' या प्राचीन काल के राजवंशों से जोड़ा जाता है।
काकतीय वंश:
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 13वीं शताब्दी में यह हीरा दक्षिण भारत के काकतीय राजवंश के पास था। राजा प्रतापरुद्र के शासनकाल में यह हीरा वारंगल के एक मंदिर में देवी की मूर्ति की आंख के रूप में सुसज्जित था।
दिल्ली सल्तनत और मुगलों के पास आगमन
इस नायाब हीरे का वास्तविक उथल-पुथल भरा सफर तब शुरू हुआ जब उत्तर भारत के शासकों की नजर इस पर पड़ी।
खिलजी वंश का आक्रमण: सन 1310 के आसपास दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने वारंगल पर आक्रमण किया।
इस दौरान मंदिर और राजकोष की लूट के साथ यह बेशकीमती हीरा दिल्ली सल्तनत के पास आ गया। बाबर का अधिकार: दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राजवंशों (खिलजी, तुगलक और लोदी) के हाथों से होते हुए यह हीरा आखिरकार वर्ष 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद मुगल सम्राट बाबर के हाथ लगा।
बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में भी इस बेमिसाल हीरे का जिक्र किया है। मुगल साम्राज्य का वैभव: बाबर के बाद हुमायूं, अकबर और शाहजहाँ जैसे मुगल बादशाहों के पास यह हीरा उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी शाही खजाने और मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताऊस) की शान बढ़ाता रहा।
नादिर शाह द्वारा भारत से ईरान ले जाना
मुगलों के पास सुरक्षित रहने के बाद इस हीरे के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 18वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर धावा बोला।
ईरानी आक्रमण: वर्ष 1739 में फारस (ईरान) के क्रूर शासक नादिर शाह نے दिल्ली पर आक्रमण किया।
मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को पराजित करने के बाद नादिर शाह ने दिल्ली में अपार धन-संपत्ति और ऐतिहासिक मयूर सिंहासन को लूटा। कोहिनूर नामकरण:
जब नादिर शाह इस हीरे को अपने साथ फारس (ईरान) ले जा रहा था, तब इसे 'कोहिनूर' (यानी रोशनी का पर्वत) नाम मिला। ऐसा कहा जाता है कि जब उसने पहली बार इस हीरे की चमक को देखा था, तो उसके मुंह से अचानक निकला था— "कोह-इ-नूर!"
(यह इस लेख का पहला भाग है। अगले भाग में हम जानेंगे कि कैसे नादिर शाह के बाद यह हीरा वापस भारत लौटा, महाराजा रणजीत सिंह के पास कैसे आया और अंततः अंग्रेजों के हाथ लग कर ब्रिटेन कैसे पहुंचा।)
क्या आप यह जानना चाहते हैं कि वर्तमान में इस हीरे को भारत वापस लाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
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