प्राक्कथन: समय की शिलाओं पर उत्कीर्ण गाथा
ज्ञान, साधना और क्रांतियों की उर्वर भूमि, बिहार। जब भी इस प्राचीन भूगोल का स्मरण होता है, मन में पाटिलपुत्र की धूल, नालंदा के जलते हुए पुस्तकालयों की सुगन्ध और सम्राट अशोक की शांति का संदेश स्वतः गूंजने लगता है। क्या आपने कभी सोचा है कि आधुनिक मानचित्र पर दिखने वाला यह भूभाग किस प्रकार एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में जन्मा था? बिहार राज्य के गठन की यह कहानी किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं है, जिसमें औपनिवेशिक षड्यंत्र, जन-आंदोलन और संघर्ष के कई अनछुए अध्याय दबे हुए हैं।
ब्रिटिश राज और बंगाल प्रेसिडेंसी का विराट साया
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक सरगर्मी चरम पर थी। उस कालखंड में आज का बिहार, झारखंड और ओडिशा—ये सभी भूभाग संयुक्त रूप से अंगेजों की विशाल बंगाल प्रेसिडेंसी के अधीन संचालित होते थे। क्षेत्रफल और जनसंख्या के लिहाज से यह प्रशासनिक क्षेत्र इतना विराट था कि ब्रिटिश हुकूमत के लिए इसका सुचारू नियंत्रण लगभग असंभव हो चला था।
प्रशासनिक सुविधा के नाम पर अंग्रेजों की अपनी मजबूरियां थीं, किंतु इस विशालता के कारण बिहार और यहाँ के निवासियों की सांस्कृतिक तथा भाषाई अस्मिता कहीं खो सी गई थी। बंगाली भाषियों का प्रशासनिक और राजनीतिक वर्चस्व इस कदर हावी था कि क्षेत्रीय स्तर पर स्थानीय बोलियों—जैसे भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका—तथा यहाँ की संस्कृति को वह मुखर मंच नहीं मिल पा रहा था, जिसकी वह अधिकारिणी थी।
वह ऐतिहासिक मोड़: 22 मार्च 1912
तमाम विरोधों, वैचारिक मंथनों और बुद्धजीवियों के अथक प्रयासों के बाद आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आया जिसने नक्شه बदल दिया। 22 मार्च 1912 का वह सूर्योदय बिहार के लिए एक नए युग का सूत्रपात लेकर आया।
यह केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं था; यह सदियों से उपेक्षित एक प्राचीन सभ्यता की पुनर्जीवन गाथा थी।
संघर्ष के वे पुरोधा: जिनके कारण मिला अस्तित्व
किसी भी राज्य का सृजन रातों-रात नहीं होता। इसके पीछे अनगिनत स्वप्नदर्शियों का त्याग और समर्पण निहित होता है। आधुनिक बिहार के निर्माण की इस लंबी लड़ाई में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा, महेश नारायण, और बाबू महेश्वर प्रसाद जैसे महान मनीषियों ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई। उन्होंने 'द बिहारी' और 'बिहार टाइम्स' जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से हुक्मरानों के कानों तक यह बात पहुंचाई कि बंगाल की छांव में बिहार अपनी मौलिक पहचान खो रहा है।
इन अग्रदूतों की वैचारिक चेतना और निरंतर उठाई गई मांगों ने ब्रिटिश साम्राज्य को विवश कर दिया कि वे बिहार को उसकी अपनी स्वायत्तता सौंप दें। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को संपूर्ण राज्य में 'बिहार दिवस' के रूप में एक उत्सव मनाया जाता है, जो हमें हमारे पूर्वजों के संघर्षों की याद दिलाता है।
बिहार राज्य के गठन का अंतिम चरण और ऐतिहासिक बदलाव
झारखंड का विभाजन और आधुनिक स्वरूप
वर्ष 1912 में बंगाल से अलग होकर अस्तित्व में आया बिहार लंबे समय तक अपने शुरुआती भौगोलिक स्वरूप में रहा।
खनिज संपन्न क्षेत्र: बिहार के दक्षिणी हिस्से में आदिवासी बहुल क्षेत्र और अपार खनिज संपदा मौजूद थी।
पृथक्करण की मांग: लंबे सामाजिक व राजनीतिक संघर्ष के बाद इस क्षेत्र के विकास और स्थानीय अधिकारों को ध्यान में रखा गया।
नया राज्य:
अंततः 15 नवंबर 2000 को भारत सरकार के अधिनियम के तहत बिहार का विभाजन हुआ और इसका दक्षिणी हिस्सा अलग होकर झारखंड के रूप में देश का 28वां राज्य बन गया।
निष्कर्ष
इस प्रकार, आधुनिक बिहार राज्य का सफर 22 मार्च 1912 को बंगाल प्रेसीडेंसी से एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में शुरू हुआ था।
महत्वपूर्ण तथ्य: ऐतिहासिक परिवर्तनों के बावजूद बिहार ने अपनी प्राचीन बौद्ध संस्कृति, शिक्षा के केंद्रों और विशिष्ट पहचान को आज भी जीवित रखा है।
यह वीडियो बिहार के प्राचीन काल से लेकर आधुनिक गठन और उसके बाद हुए ऐतिहासिक विभाजनों की पूरी कहानी को विस्तार से समझाता है।

टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।