1. प्रस्तावना: शीत युद्ध का अंत और एक महाशक्ति का पतन

वर्ष 1991 का दिसंबर महीना विश्व इतिहास के सबसे बड़े और नाटकीय राजनीतिक बदलावों में से एक का गवाह बना। इस दौरान दुनिया की दो महाशक्तियों में से एक—सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ (USSR या सोवियत संघ)—का आधिकारिक रूप से विघटन हो गया। अक्सर आम बातचीत में इसे "रूस के टुकड़े होना" कहा जाता है, हालांकि तकनीकी और ऐतिहासिक रूप से यह एक विशाल महासंघ का टूटना था, जिसमें रूस उसका सबसे बड़ा और मुख्य हिस्सा था।

2. सोवियत संघ क्या था और इसका निर्माण कैसे हुआ?

सोवियत संघ की नींव 1922 में रूसी साम्राज्य के पतन के बाद रखी गई थी। यह कोई अकेला देश नहीं था, बल्कि 15 अलग-अलग गणराज्यों (Republics) का एक शक्तिशाली संघ (Federation) था। इनमें रूस (RSFSR) के अलावा यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, जॉर्जिया, अजरबैजान, लिथुआनिया, लातविया, एस्टोनिया, मोल्दोवा, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और आर्मेनिया शामिल थे।

  • वैश्विक प्रभाव: द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के बाद सोवियत संघ संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के साथ दुनिया की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा।

  • सैन्य और वैज्ञानिक ताकत: अंतरिक्ष में पहला उपग्रह (स्पुतनिक) भेजने से लेकर परमाणु हथियारों के विशाल जखीरे तक, सोवियत संघ हर क्षेत्र में अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा था।

  • साम्यवादी विचारधारा: यह देश मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा और साम्यवाद (Communism) के सिद्धांतों पर आधारित था, जहां केंद्रीय योजनाओं के तहत अर्थव्यवस्था को चलाया जाता था।

3. विघटन के प्रमुख कारण: अंदर से कमजोर होता ढांचा

भले ही बाहर से सोवियत संघ एक अजय महाशक्ति दिखाई देता था, लेकिन इसके भीतर गहरे आर्थिक, वैचारिक और राजनीतिक संकट सुलग रहे थे। 1980 के दशक के उत्तरार्ध तक आते-आते ये संकट विकराल रूप धारण कर चुके थे।

क) गंभीर आर्थिक संकट और संसाधनों का कुप्रबंधन

सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था केंद्रीय रूप से नियोजित (Centrally Planned Economy) थी, जिसका अर्थ था कि बाजार की मांग के बजाय सरकार तय करती थी कि क्या और कितना उत्पादन होगा।

  • उपभोक्ता वस्तुओं की भारी कमी: सरकार का सारा ध्यान भारी उद्योगों और सैन्य उपकरणों (सैन्य आधुनिकीकरण) पर था। परिणामस्वरूप, आम नागरिकों के लिए जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं, खाद्यान्न और कपड़े तक की भारी कमी हो गई। लोगों को ब्रेड और दूध के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता था।

  • अदक्षता और भ्रष्टाचार: नौकरशाही के फैलते जाल और भ्रष्टाचार के कारण उत्पादकता लगातार गिरती गई। पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) के मुकाबले सोवियत तकनीक और जीवन स्तर बहुत पीछे छूट गए थे।

ख) मिखाइल गोर्बाचेव की नीतियां: ग्लासनोस्ट और पेरेस्त्रोइका

1985 में मिखाइल गोर्बाचेव (Mikhail Gorbachev) सोवियत संघ के कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था और शासन प्रणाली को सुधारने के लिए दो क्रांतिकारी नीतियां लागू कीं:

  1. पेरेस्त्रोइका (Perestroika - पुनर्रचना): इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में सुधार करना और आंशिक रूप से बाजार आधारित सुधारों को अपनाना था।

  2. ग्लासनोस्ट (Glasnost - खुलापन): इसका अर्थ था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी नीतियों पर खुली चर्चा की अनुमति देना।

महत्त्वपूर्ण मोड़: गोर्बाचेव का उद्देश्य सोवियत प्रणाली को बचाना और मजबूत करना था, लेकिन इन नीतियों ने उल्टा असर दिखाया। दशकों से दबी हुई जनता की आकांशाएं, असंतोष और भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा अचानक बाहर आ गया। ग्लासनोस्ट ने लोगों को खुलकर बोलने का अधिकार दिया, जिससे सरकार की आलोचना तेज हो गई और कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण कमजोर होने लगा।

ग) राष्ट्रवादी भावनाओं का उभार और स्वतंत्रता की मांग

सोवियत संघ में रूस के अलावा अन्य 14 गणराज्य भी शामिल थे, जिनमें से कई (विशेषकर बाल्टिक देश, लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया) जबरन या ऐतिहासिक समझौतों के तहत संघ में शामिल किए गए थे।

  • जैसे ही केंद्रीय नियंत्रण ढीला हुआ, इन गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावनाएं भड़क उठीं।

  • जनता और स्थानीय नेता अब मॉस्को के प्रभुत्व से मुक्ति चाहते थे। वे अपनी अलग संप्रभुता, भाषा, संस्कृति और स्वतंत्र अर्थव्यवस्था की मांग करने लगे।

4. निष्कर्ष (भाग 1 का सार)

1991 तक आते-आते सोवियत संघ का यह ढांचा पूरी तरह से चरमरा चुका था। आर्थिक बदहाली, गोर्बाचेव के सुधारों के अप्रत्याशित परिणाम और तेजी से उभरती राष्ट्रीय स्वतंत्रता की इच्छा ने इस विशाल साम्राज्य के पतन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी।

अगले भाग में हम विस्तार से जानेंगे कि किस प्रकार वर्ष 1991 के दौरान ऐतिहासिक समझौते हुए, सोवियत संघ कानूनी रूप से समाप्त हुआ और इसके परिणामस्वरूप कुल कितने नए स्वतंत्र देश अस्तित्व में आए।

सोवियत संघ के विघटन के बाद बने 15 नए देश

1991 में सोवियत संघ (USSR) के विघटन के साथ ही दुनिया का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया। यह महाशक्ति कुल 15 स्वतंत्र गणराज्यों (Republics) में विभाजित हो गई। इनमें रूस (रशियन फेडरेशन) सबसे बड़ा हिस्सा था, जिसे कानूनी रूप से सोवियत संघ का उत्तराधिकारी माना गया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसकी सीट सौंपी गई।

इन 15 नए देशों को भौगोलिक रूप से चार प्रमुख क्षेत्रों में बांटा गया है:

  • बाल्टिक देश: एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया।

  • पूर्वी यूरोपीय देश: यूक्रेन, बेलारूस और मोल्दोवा।

  • काकेशस क्षेत्र: जॉर्जिया, आर्मेनिया और अज़रबैजान।

  • मध्य एशियाई देश: कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान।

इन सभी राष्ट्रों ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। हालांकि, इस अचानक हुए विभाजन से कई नव-स्वतंत्र देशों में आर्थिक संकट, मुद्रास्फीति और क्षेत्रीय सीमा विवाद जैसी गंभीर समस्याएं भी पैदा हुईं, जिनके प्रभाव आज भी पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया की राजनीति में देखे जा सकते हैं।

भू-राजनीतिक प्रभाव और शीत युद्ध की समाप्ति

सोवियत संघ का टूटना केवल भौगोलिक बदलाव नहीं था, बल्कि इसने वैश्विक राजनीति की पूरी दिशा बदल दी। इसके दूरगामी परिणाम निम्नलिखित रहे:

  • शीत युद्ध का अंत: अमेरिका और सोवियत संघ के बीच दशकों से चला आ रहा तनावपूर्ण 'शीत युद्ध' आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया।

  • एकध्रुवीय विश्व: कुछ समय के लिए अमेरिका वैश्विक मंच पर एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा, जिससे पश्चिमी देशों का प्रभाव काफी बढ़ गया।

  • कूटनीतिक बदलाव: भारत जैसे देशों को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाते हुए रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को सहेजना पड़ा और साथ ही नए मध्य एशियाई व पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ भी मजबूत आर्थिक और सामरिक रिश्ते स्थापित करने पड़े।

निष्कर्ष: इतिहास का एक नया अध्याय

संक्षेप में कहें तो, 1991 की इन ऐतिहासिक घटनाओं ने एक विशाल साम्राज्य का अंत कर दिया। रूस सहित 15 स्वतंत्र राष्ट्रों का उदय इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक और आर्थिक कुप्रबंधन किसी भी बड़े से बड़े साम्राज्य को ढाह सकता है। सोवियत संघ का यह विघटन आधुनिक विश्व इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में से एक है, जिसने इक्कीसवीं सदी की वैश्विक व्यवस्था और बहुध्रुवीय दुनिया की नींव रखी।