विषय-सूची
रूस और भारत: एक अटूट और ऐतिहासिक मित्रता की नीव
भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंधों का इतिहास केवल कूटनीति, व्यापार या समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी आत्मीय और रणनीतिक साझेदारी की दास्तान है जो दशकों के उतार-चढ़ाव के बीच भी चट्टान की तरह अडिग रही है। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के समक्ष कोई गंभीर संकट आया या पश्चिमी देशों के दबाव के कारण भारत अलग-थलग पड़ता नजर आया, तब मास्को (Moscow) ने हमेशा नई दिल्ली के सबसे भरोसेमंद और संकटमोचक मित्र की भूमिका निभाई।
इस लेख की इस पहली कड़ी में हम विस्तार से समझेंगे कि शीत युद्ध (Cold War) के दौर से लेकर आधुनिक भू-राजनीति तक, रूस (और पूर्व सोवियत संघ) ने भारत की कितनी बार और किस प्रकार ऐतिहासिक कूटनीतिक, सैन्य और रणनीतिक सहायता की है।
1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वीटो पावर का अचूक सुरक्षा कवच
भारत की विदेश नीति और संप्रभुता की रक्षा में रूस द्वारा यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल (UNSC) में किए गए वीटो (Veto) का इस्तेमाल सबसे बड़ा और निर्णायक योगदान माना जाता है। भारत के आंतरिक मामलों या क्षेत्रीय अखंडता को जब-जब पश्चिमी देशों या पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने की कोशिश की गई, तब रूस ने अपने वीटो अधिकार का खुलकर उपयोग किया।
कश्मीर का मुद्दा और सोवियत वीटो: 1950 के दशक से ही कश्मीर मामले पर पश्चिमी देश भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे। सोवियत संघ (USSR) ने 1957 और 1962 में सुरक्षा परिषद में कश्मीर के खिलाफ लाए गए प्रस्तावों पर वीटो पावर का इस्तेमाल करके भारत को बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत दिलाई। सोवियत संघ ने स्पष्ट कर दिया था कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इस पर किसी बाहरी हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम (1971): 1971 का भारत-पाक युद्ध भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। जब भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी का समर्थन कर रही थी, तब अमेरिका और चीन ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ दबाव बढ़ा दिया था। उस समय अमेरिका के सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया गया था। ऐसे संकट के क्षण में, भारत और सोवियत संघ ने 'भारत-सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग संधि' (1971) पर हस्ताक्षर किए। सोवियत संघ ने अमेरिका और चीन को साफ चेतावनी दी कि यदि उन्होंने भारत पर आक्रमण किया, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इसके साथ ही, UNSC में सोवियत संघ ने तीन बार वीटो का उपयोग करके अमेरिकी प्रस्तावों को खारिज कर दिया, जिससे भारत को अपनी जीत सुनिश्चित करने का पूरा मौका मिला।
2. भारतीय रक्षा क्षेत्र की रीढ़: सैन्य आपूर्ति और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर
भारतीय सशस्त्र बलों (थल सेना, नौसेना और वायु सेना) की रीढ़ हमेशा से सोवियत और रूसी हथियार रहे हैं। जब दुनिया के बाकी देश भारत को आधुनिक सैन्य तकनीक देने से कतराते थे या पाबंदियां (Sanctions) लगाते थे, तब रूस ने बिना किसी शर्त के भारत को अत्याधुनिक हथियार और रक्षा तकनीक मुहैया कराई।
स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को बढ़ावा: रूस ने केवल तैयार हथियार ही भारत को नहीं बेचे, बल्कि भारत में ही हथियारों के निर्माण के लिए 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर' (Technology Transfer) की संस्कृति को बढ़ावा दिया। आज भारत ब्रह्मोस (BrahMos) जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें बना पा रहा है, जो रूस (NPOM) और भारत (DRDO) का संयुक्त उपक्रम है।
हथियारों की विविधता और निर्भरता: भारतीय वायु सेना के पास सुखोई (Su-30MKI), मिग (MiG) विमान, थल सेना के पास टी-90 और टी-72 टैंक, और नौसेना के पास आईएनएस विक्रमादित्य (INS Vikramaditya) जैसे विमानवाहक पोत और परमाणु पनडुब्बियां (जैसे चक्र श्रेणी) रूस के साथ घनिष्ठ रक्षा सहयोग का ही परिणाम हैं। जब 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, तब रूस ही एकमात्र बड़ा देश था जिसने भारत के साथ अपने रक्षा संबंधों को न केवल जारी रखा, बल्कि उन्हें और अधिक प्रगाढ़ किया।
3. ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता
किसी भी देश की आर्थिक प्रगति के लिए उसकी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सबसे महत्वपूर्ण होती है। रूस ने भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में हमेशा एक उदार और विश्वसनीय भागीदार की भूमिका निभाई है।
परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy): भारत में ऊर्जा की कमी को दूर करने के लिए परमाणु ऊर्जा का विकास बेहद जरूरी था। तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Kudankulam Nuclear Power Plant) का निर्माण रूस की तकनीकी और वित्तीय सहायता से ही संभव हो पाया है। जब अन्य देशों ने परमाणु तकनीक साझा करने से इनकार कर दिया था, तब रूस ने भारत के साथ इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया।
अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO और अंतरिक्ष सहयोग): भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत में भी सोवियत संघ का अमूल्य योगदान रहा है। भारत के पहले उपग्रह 'आर्यभट्ट' को 1975 में सोवियत संघ के लॉन्च वाहन की मदद से ही अंतरिक्ष में भेजा गया था। इसके अलावा, भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान 'सोयुज टी-11' से अंतरिक्ष की यात्रा की थी। आज गगनयान मिशन के लिए भी भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को रूस के प्रशिक्षण केंद्रों में विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है।
निष्कर्ष (पहली भाग का सारांश)
संक्षेप में कहा जाए तो रूस ने भारत की मदद अनगिनत बार और हर उस मोड़ पर की है जब भारत को अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और विकास के लिए एक सच्चे और मजबूत साथी की आवश्यकता थी। कूटनीतिक मोर्चे पर वीटो का इस्तेमाल हो, युद्ध के मैदान में रणनीतिक ढाल बनना हो, या फिर रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना हो—रूस ने हर कसौटी पर अपनी मित्रता को साबित किया है।
(यह इस लेख का पहला भाग है। अगले भाग में हम समकालीन भू-राजनीति, कच्चे तेल के व्यापार और बदलते वैश्विक समीकरणों के संदर्भ में रूस और भारत के संबंधों के नए आयामों पर चर्चा करेंगे।)
रणनीतिक और रक्षा सहयोग: भारत के लिए रूस की ढाल
वैश्विक कूटनीति के पन्नों को पलटें तो भारत और रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) की दोस्ती केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह समय की हर कसौटी पर खरी उतरी है। 1971 के ऐतिहासिक भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब अमेरिका और ब्रिटेन अपने युद्धपोत बंगाल की खाड़ी की तरफ भेज रहे थे, तब सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई बार अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत को अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाया था। यह रूस का वह खुला समर्थन था जिसने दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण को हमेशा के लिए बदल दिया।
अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा में अभूतपूर्व सहायता
केवल युद्ध के मैदान या कूटनीति में ही नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीकी के मोर्चे पर भी रूस ने भारत का हमेशा हाथ थामी रखा।
अंतरिक्ष की उड़ान: भारत के पहले अंतरिक्ष उपग्रह 'आर्यभट्ट' (1975) को अंतरिक्ष तक पहुंचाने में सोवियत संघ ने ही मुख्य तकनीकी और वैज्ञानिक मदद दी थी। इसके बाद 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा का सोवियत अंतरिक्ष यान 'सोयूज़ टी-11' से अंतरिक्ष जाना इस गहरी दोस्ती का सबसे चमकदार उदाहरण बना।
परमाणु और ऊर्जा क्षेत्र: जब पश्चिमी देशों ने भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, तब रूस ने तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र सहित अन्य ऊर्जा परियोजनाओं को पूरा करने में खुलकर तकनीकी सहायता प्रदान की।
आधुनिक रक्षा साझीदारी और भविष्य का दृष्टिकोण
आज के दौर में भी भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस पर भरोसा करता आया है। सुखोई लड़ाकू विमान हों, टी-90 टैंक हों या अत्याधुनिक एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम—रूस ने हमेशा भारत को अपनी सबसे बेहतरीन सैन्य तकनीक सौंपी है। इसके अलावा, 'ब्रह्मोस' जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का विकास दोनों देशों के साझा तकनीकी सहयोग का ही परिणाम है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि रूस ने अनगिनत बार कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य मोर्चों पर भारत की संकटमोचन की भूमिका निभाई है। आज बदलते वैश्विक परिदृश्य में भी दोनों देशों के बीच की यह साझेदारी क्षेत्रीय स्थिरता और बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण के लिए उतनी ही प्रासंगिक है जितनी दशकों पहले थी।
क्या आप भारत और रूस के बीच हालिया रक्षा समझौतों या व्यापारिक साझेदारियों के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।