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भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू ने 25 जुलाई, 2022 को शपथ लेकर एक नया इतिहास रच दिया। वह देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति और स्वतंत्र भारत में पैदा होने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। ओडिशा के एक छोटे से गाँव से निकलकर रायसीना हिल्स तक का उनका यह सफर सिर्फ एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस गहराई का प्रमाण है जहाँ एक साधारण पृष्ठभूमि का व्यक्ति भी सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँच सकता है।
एक साधारण शुरुआत और असाधारण संकल्प की नींव
द्रौपदी मुर्मू का जन्म ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गाँव में एक संताल आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम 'पुति' था, जिसे बाद में उनके एक स्कूल शिक्षक ने बदलकर द्रौपदी रख दिया। उनका शुरुआती जीवन संघर्षों की एक लंबी दास्तान है। बिजली और बुनियादी सुविधाओं से महरूम उस दौर में, उन्होंने शिक्षा को अपनी ढाल बनाया। भुवनेश्वर के रमा देवी महिला कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने ओडिशा सरकार के सिंचाई विभाग में एक कनिष्ठ सहायक के रूप में अपना करियर शुरू किया।
उनका व्यक्तित्व संयम और अटूट धैर्य की मिसाल है। 2009 से 2015 के बीच उन्होंने अपने पति और दो बेटों को खो दिया। इस निजी त्रासदी ने किसी भी आम इंसान को तोड़ दिया होता, लेकिन मुर्मू ने अध्यात्म और जनसेवा में खुद को झोंक दिया। राजनीति में उनका प्रवेश 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत के पार्षद के रूप में हुआ था। वह दो बार विधायक रहीं और ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार में मंत्री के रूप में परिवहन और वाणिज्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला। उनकी कार्यशैली हमेशा शांत लेकिन प्रभावी रही है, जिसने उन्हें विपक्षी दलों के बीच भी सम्मान दिलाया।
संवैधानिक गरिमा और राजनीतिक चयन का गहरा विश्लेषण
द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद के लिए चुना जाना महज एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरी रणनीतिक और सामाजिक दूरदर्शिता छिपी थी। जब एनडीए ने उनके नाम की घोषणा की, तो इसने पूरे देश के राजनीतिक विमर्श को बदल दिया। एक ऐसी महिला जो झारखंड की पहली महिला राज्यपाल रह चुकी थीं और जिनका कार्यकाल विवादों से पूरी तरह मुक्त रहा, उन्हें इस पद के लिए चुनना समावेशी राजनीति की एक उत्कृष्ट मिसाल थी। उन्होंने अपने राज्यपाल काल के दौरान कई बार आदिवासी हितों की रक्षा के लिए अपनी ही सरकार के निर्णयों पर पुनर्विचार के निर्देश दिए थे, जो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष कार्यप्रणाली को दर्शाता है।
राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उन्हें 64 प्रतिशत से अधिक वैध मत प्राप्त हुए, जिसमें विपक्ष के कई सांसदों और विधायकों ने भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उन्हें वोट दिया। यह 'क्रॉस वोटिंग' इस बात का संकेत थी कि उनकी स्वीकार्यता किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है। उनका चयन भारत के हाशिए पर खड़े समुदायों को एक सशक्त संदेश देता है कि संविधान की प्रस्तावना में निहित 'हम भारत के लोग' शब्द केवल कागजी नहीं हैं। यह शक्ति के विकेंद्रीकरण और सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐसा कदम था, जिसने वैश्विक स्तर पर भारतीय लोकतंत्र की छवि को और अधिक मजबूत और मानवीय बनाया है।
व्यावहारिक निहितार्थ और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रभाव
द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से भारतीय प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे पर दूरगामी प्रभाव पड़े हैं। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उस मनोवैज्ञानिक बैरियर का टूटना है, जो अक्सर आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा की राजनीति से अलग महसूस कराता था। उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन 'आम जनता का भवन' बनने की दिशा में और अधिक अग्रसर हुआ है। वह अक्सर विभिन्न राज्यों के दौरे पर स्थानीय भाषाओं और परंपराओं को सम्मान देती नजर आती हैं, जिससे संघीय ढांचे के भीतर सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत हुआ है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से, मुर्मू की उपस्थिति उन क्षेत्रों के लिए आशा की किरण है जहाँ विकास की किरण अब तक नहीं पहुँच पाई थी। जब एक आदिवासी महिला देश की तीनों सेनाओं की सर्वोच्च सेनापति (सुप्रीम कमांडर) बनती है, तो वह केवल फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं करती, बल्कि वह उन लाखों लड़कियों के लिए रोल मॉडल बन जाती है जो अभावों के बीच बड़े सपने देखती हैं। उनके इस पद पर आसीन होने से संविधान के प्रति आम नागरिकों का विश्वास गहरा हुआ है। यह साबित हो गया है कि भारतीय लोकतंत्र में योग्यता, सेवा और समर्पण ही वह अंतिम पैमाना है जो किसी भी व्यक्ति को राष्ट्र के प्रथम नागरिक की कुर्सी तक ले जा सकता है।
भारत की 15वीं राष्ट्रपति से जुड़ी सामान्य गलतियां और विशेषज्ञ सुझाव
अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं या सामान्य चर्चाओं में लोग भारत के राष्ट्रपति क्रम को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। सबसे आम गलती द्रौपदी मुर्मू के कार्यकाल की संख्या को लेकर होती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यह स्पष्ट रूप से याद रखें कि वह भारत की 15वीं व्यक्तिगत राष्ट्रपति हैं। कई बार लोग कार्यवाहक राष्ट्रपतियों को भी मुख्य सूची में जोड़ देते हैं, जिससे गणना गलत हो जाती है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वह देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति और पहली आदिवासी राष्ट्रपति हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु जो अक्सर छूट जाता है, वह है उनका शपथ ग्रहण वर्ष। उन्होंने 25 जुलाई 2022 को पदभार ग्रहण किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी नियुक्ति को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की समावेशी शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके जीवन के संघर्षों और ओडिशा के एक छोटे से गांव से रायसीना हिल्स तक के सफर को समझना उनके व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन करने में मदद करता है। यदि आप किसी साक्षात्कार की तैयारी कर रहे हैं, तो उनके द्वारा पूर्व में संभाले गए झारखंड के राज्यपाल के पद के कार्यकाल को भी ध्यान में रखें।
---अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत की 15वीं राष्ट्रपति कौन हैं और उनका जन्म कब हुआ था?
भारत की 15वीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं। उनका जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के ऊपरबेड़ा गांव में हुआ था। वह स्वतंत्र भारत में पैदा होने वाली पहली राष्ट्रपति भी हैं।
2. राष्ट्रपति बनने से पहले द्रौपदी मुर्मू किस महत्वपूर्ण पद पर थीं?
द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति निर्वाचित होने से पहले 2015 से 2021 तक झारखंड की पहली महिला राज्यपाल के रूप में कार्य कर चुकी हैं। इससे पहले वह ओडिशा सरकार में मंत्री और विधायक के रूप में भी सक्रिय रही थीं।
3. भारत के राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है?
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष जनता द्वारा नहीं, बल्कि एक इलेक्टोरल कॉलेज (निर्वाचक मंडल) द्वारा किया जाता है। इसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं।
---संपादकीय निष्कर्ष
द्रौपदी मुर्मू का भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में चुना जाना भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत का लोकतंत्र जमीन से जुड़े व्यक्ति को भी देश के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाने की क्षमता रखता है। उनका सादा जीवन और उच्च विचार न केवल समाज के वंचित वर्गों के लिए प्रेरणा हैं, बल्कि पूरे देश के लिए महिला सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण हैं। राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल भारत की विविधता और एकता के प्रतीक के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।
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