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जब भी हमारे देश की भाषाई विविधता पर बात छिड़ती है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर इंडिया की सबसे मीठी भाषा कौन सी है। कई लोग बंगाल के रसगुल्लों सी घुली हुई बांग्ला को इस पायदान पर रखते हैं, तो कुछ लोग बृजभाषा या उर्दू के लहजे को उसकी मिठास के लिए सबसे आगे मानते हैं। सच तो यह है कि भाषाई मिठास का कोई पैमाना लैब में नहीं तोला जा सकता, यह पूरी तरह से सुनने वाले केकान और दिल के तार पर निर्भर करती है। हर भारतीय जुबान की अपनी एक तासीर और खनक है, जो क्षेत्रीय आबोहवा और संस्कृति से गढ़कर तैयार हुई है।
भारत की भाषाई विविधता और वक्ता डेटा के महत्वपूर्ण आंकड़े
हमारे देश का भाषा-विज्ञान बेहद जटिल और विशालकाय है। साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर अगर हम नजर डालें, तो भारत में 19,500 से अधिक बोलियां और मातृभाषाएं बोली जाती हैं, जिन्हें लगभग 121 मुख्य कैटेगरी में बांटा गया है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 प्रमुख भाषाओं को आधिकारिक दर्जा हासिल है। इन आंकड़ों के भीतर हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मातृभाषा है, जिसके वक्ताओं का आंकड़ा 43 प्रतिशत से अधिक है। वहीं बांग्ला दूसरे और मराठी तीसरे स्थान पर काबिज है। दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण भारत के राज्यों में द्रविण परिवार की भाषाएं जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम करोड़ों लोगों की सांसों में बसी हैं। हर भाषा का अपना एक विशाल व्याकरणिक इतिहास और प्राचीन साहित्यिक खजाना है, जो समय के साथ और ज्यादा समृद्ध होता गया है। आंकड़ों की यह बाजीगरी सिर्फ संख्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक गहराई को दर्शाती है जो हर सौ किलोमीटर पर अपनी बोली और टोन बदल लेती है। जब हम मिठास की तलाश करते हैं, तो ये आंकड़े हमें बताते हैं कि देश का कोना-कोना कितनी अनमोल भाषाई दौलत समेटे हुए है। किसी एक भाषा को सबसे ऊपर रख देना बाकी तमाम बोलियों के उस सदियों पुराने इतिहास के साथ नाइंसाफी होगी जो पीढ़ियों से लोकगीतों और कथाओं के जरिए जीवित रहा है।
बांग्ला, उर्दू और ब्रजभाषा की मिठास और लहजे की तुलना
जब बातानुकूलित मिठास की आती है, तो जुबान पर सबसे पहले बांग्ला, उर्दू और बृजभाषा का नाम उभरकर सामने आता है। बांग्ला को लेकर अक्सर यह कहा जाता है कि उसके शब्दों का उच्चारण ही किसी संगीत की तरह कानों में रस घोल देता है। इसमें महाप्राण ध्वनियों का प्रयोग और स्वरों का खिंचाव इसे एक अनोखा प्रवाह देता है जो बंगाल की नदियों और कलात्मक संस्कृति से उपजा है। दूसरी तरफ, उर्दू अपनी नफासत, शायरी और लफ्जों की नजाकत के लिए पूरी दुनिया में पहचानी जाती है। इसके शेरो-शायरी वाले अंदाज में 'तहजीब' इस तरह घुली होती है कि बात करते वक्त खुद-ब-खुद एक अदब पैदा हो जाता है, जिसे सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है। वहीं अगर हम लोक भाषाओं की तरफ रुख करें, तो कृष्ण की भूमि से जुड़ी बृजभाषा की मिठास का कोई सानी नहीं है। सूरदास के पदों और भक्तिकाल की कविताओं में बृजभाषा का जो रूप निखर कर आया है, वह सीधे दिल को छूता है। इन तीनों की तुलना करें तो पाएंगे कि बांग्ला में काव्यात्मक बहाव है, उर्दू में शब्दों की रेशमी नरमी है, और बृजभाषा में ठेठ गंवई अपनापन और प्रेम की महक है। हर शैली का अपना एक अलग मनोविज्ञान है जो श्रोता के भीतर खास तरह की भावनाएं जगाता है। कोई एक दूसरे से कमतर नहीं है, बस उनके स्वाद और रस के अनुभव अलग-अलग हैं।
भाषाई श्रेष्ठता के भ्रम और क्षेत्रीय अतिवाद के खतरे
किसी एक भाषा को दूसरी से ज्यादा मीठा या श्रेष्ठ साबित करने की जिद कई बार खतरनाक मोड़ों पर ले जाती है। जब लोग अतिवाद में आकर अपनी भाषा को ही सर्वोपरि मानने लगते हैं, तो इससे भाषाई अहंकार और क्षेत्रीय तनाव पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी खास बोली को जबरन थोपने या दूसरी बोलियों को हीन दिखाने की कोशिश हुई, तब-तब सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुंची है। भाषा का मूल उद्देश्य संवाद स्थापित करना और दिलों को जोड़ना है, न कि उसके आधार पर दीवारें खड़ी करना। अगर हम सिर्फ 'मिठास' के फेर में पड़कर अन्य बोलियों की समृद्ध विरासत को नजरअंदाज करेंगे, तो हम अपनी ही विविधता की जड़ें काटने लगेंगे। हर भाषा का अपना आंतरिक सौंदर्य होता है और उसे उसी रूप में स्वीकार करना बुद्धिमानी है। भाषा कोई प्रतियोगिता नहीं है जिसे कोई जीते या हारे, यह तो इंसानी जज्बातों को व्यक्त करने का एक जरिया है। इसलिए जरूरी यह है कि हम हर जुबान की इज्जत करें और उसके लहजे की खूबसूरती को बिना किसी पूर्वाग्रह के महसूस करें, तभी असली सांस्कृतिक सद्भाव कायम रह सकता है।
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