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भारत के आर्थिक नियोजन के इतिहास में 1 जनवरी 2015 का दिन एक युगांतकारी मोड़ था, जब दशकों पुराने योजना आयोग को भंग कर नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना की गई। यदि आप सीधे और सटीक उत्तर की तलाश में हैं, तो नीति आयोग के पहले अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। चूँकि यह संस्था प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कार्य करती है, इसलिए इसके गठन के साथ ही उन्होंने पदभार संभाला। यह मात्र एक पदवी नहीं, बल्कि भारतीय शासन व्यवस्था में 'सहयोगात्मक संघवाद' की दिशा में उठाया गया एक साहसिक कदम था।
परिवर्तन की नींव: योजना आयोग से नीति आयोग तक का सफर
सालों से चली आ रही नेहरूवादी समाजवाद की छाया से निकलकर, भारत को एक ऐसी संस्था की दरकार थी जो 'टॉप-डाउन' मॉडल के बजाय 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण पर काम करे। सोवियत संघ की तर्ज पर बना पुराना योजना आयोग राज्यों पर अपनी नीतियां थोपता था, जिससे क्षेत्रीय आकांक्षाएं अक्सर दम तोड़ देती थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले की प्राचीर से योजना आयोग की विदाई की घोषणा की, तो वह केवल एक कार्यालय बंद करने की बात नहीं थी, बल्कि दिल्ली के गलियारों में कैद विकास की चाबी को राज्यों के हाथों में सौंपने की एक वैचारिक क्रांति थी।
नीति आयोग, जिसका पूर्ण रूप 'नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' है, को एक 'थिंक टैंक' के रूप में गढ़ा गया। इसके पहले अध्यक्ष के रूप में नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र और राज्य प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि साझेदार हैं। योजना आयोग की पंचवर्षीय योजनाओं की जड़ता को खत्म कर, 15 साल के विजन डॉक्यूमेंट और 7 साल की रणनीति को अपनाया गया। यहाँ जटिलता यह थी कि कैसे एक विविध राष्ट्र को एक समान आर्थिक धरातल पर लाया जाए। पहले अध्यक्ष का विजन स्पष्ट था: भारत तभी बढ़ेगा जब भारत के राज्य बढ़ेंगे। यह 'टीम इंडिया' की अवधारणा का जन्म था, जहाँ प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री एक ही मेज पर बैठकर भविष्य का खाका खींचते हैं।
वैचारिक विश्लेषण: पहले अध्यक्ष की भूमिका और नीतिगत बदलाव
अध्यक्ष के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ने नीति आयोग को केवल एक सलाहकार निकाय तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे नवाचार का केंद्र बना दिया। योजना आयोग के पास फंड आवंटित करने की शक्ति थी, जो अक्सर राजनीतिक पक्षपात का जरिया बन जाती थी। नीति आयोग से यह शक्ति छीनकर वित्त मंत्रालय को दी गई, ताकि आयोग का पूरा ध्यान केवल बौद्धिक नेतृत्व और डेटा-संचालित नीति निर्माण पर रहे। इस सूक्ष्म अंतर ने पूरी प्रशासनिक मशीनरी की कार्यक्षमता को बदल कर रख दिया। अब विकास का पैमाना केवल खर्च किया गया पैसा नहीं, बल्कि जमीन पर आए परिणाम (Outcomes) बन गए।
अटल इनोवेशन मिशन हो या आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme
नीति आयोग और इसके अध्यक्ष: सामान्य गलतियाँ और विशेषज्ञ सुझाव
अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं या सामान्य चर्चाओं में लोग इस बात को लेकर भ्रमित हो जाते हैं कि नीति आयोग के पहले अध्यक्ष कौन थे। सबसे आम गलती यह है कि लोग नीति आयोग (NITI Aayog) और पुराने योजना आयोग (Planning Commission) के बीच के अंतर को स्पष्ट नहीं कर पाते। आपको यह याद रखना चाहिए कि योजना आयोग के पहले अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे, लेकिन नीति आयोग के पहले अध्यक्ष नरेंद्र मोदी हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि नीति आयोग की संरचना को समझने के लिए इसके 'पदेन' (Ex-officio) स्वरूप पर ध्यान देना चाहिए। चूंकि भारत का प्रधानमंत्री ही इस निकाय का पदेन अध्यक्ष होता है, इसलिए 1 जनवरी 2015 को इसकी स्थापना के समय जो प्रधानमंत्री पद पर आसीन थे, वही इसके पहले अध्यक्ष बने। एक और महत्वपूर्ण टिप यह है कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के बीच भ्रमित न हों; नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष अरविन्द पनगढ़िया थे। सटीक तैयारी के लिए हमेशा आधिकारिक सरकारी गजट या नीति आयोग की वेबसाइट का संदर्भ लें, क्योंकि सरकारी नियुक्तियों में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन 'प्रथम' का स्थान हमेशा निश्चित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. नीति आयोग के पहले अध्यक्ष का कार्यकाल कब शुरू हुआ?
नीति आयोग के पहले अध्यक्ष के रूप में नरेंद्र मोदी का कार्यकाल 1 जनवरी 2015 से शुरू हुआ। यह वही दिन है जब भारत सरकार ने एक कैबिनेट प्रस्ताव के माध्यम से योजना आयोग को भंग कर नीति आयोग (National Institution for Transforming India) की स्थापना की थी।
2. क्या नीति आयोग का अध्यक्ष चुना जाता है?
नहीं, नीति आयोग के अध्यक्ष का चुनाव नहीं होता है। भारत
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