भारत को आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के लिए शुरू की गई 'स्मार्ट सिटीज मिशन' के तहत कुल 100 शहरों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। सरकार ने इस महात्वाकांक्षी योजना के लिए सौ रत्नों को चुना ताकि देश के शहरी ढांचे की पूरी तस्वीर को बदला जा सके। हालांकि कागजी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच एक बारीक लकीर हमेशा खिंची रहती है, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह संख्या सौ पर ही थमी है। यह महज एक संख्या नहीं बल्कि भारत के भविष्य का खाका है।

पृष्ठभूमि और बुनियादी ढांचा: कंक्रीट के जंगलों को तकनीक से जोड़ने की शुरुआत

जून 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना का बिगुल फूंका, तब भारतीय शहरों की हालत किसी से छिपी नहीं थी। बेतरतीब ट्रैफिक, चरमराती बिजली व्यवस्था और कचरे के ढेरों के बीच एक ऐसे समाधान की दरकार थी जो टिकाऊ हो। सरकार ने एक कड़े कॉम्पिटिशन के जरिए चार अलग-अलग चरणों में इन 100 शहरों का चयन किया। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य केवल चमचमाती इमारतें बनाना नहीं था, बल्कि कोर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना था।

स्मार्ट सिटी का मतलब हर शहर के लिए अलग था। जहां वाराणसी जैसे प्राचीन शहर के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाते हुए आधुनिक होना चुनौती थी, वहीं इंदौर जैसे शहरों के लिए स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) सर्वोपरि था। इस योजना के तहत इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) को रीढ़ की हड्डी माना गया। आज देश के लगभग सभी चयनित शहरों में ये कमांड सेंटर चालू हैं, जो सीसीटीवी कैमरों, ट्रैफिक सेंसर और आपातकालीन सेवाओं को एक ही छत के नीचे से नियंत्रित करते हैं। डेटा-संचालित शासन (Data-driven governance) की यह भारत में पहली बड़ी और संगठित कोशिश थी जिसने नौकरशाही के पारंपरिक ढर्रे को चुनौती दी।

मुख्य विश्लेषण: सौ का आंकड़ा और प्रगति की वास्तविक समीक्षा

क्या सभी 100 शहर वाकई 'स्मार्ट' बन चुके हैं? इस सवाल का जवाब हां और ना के पेचीदा गलियारों से होकर गुजरता है। आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों को खंगालें तो पता चलता है कि लगभग 90% से अधिक परियोजनाओं पर काम पूरा हो चुका है या वे अंतिम चरण में हैं। कुल आवंटित बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा जमीनी स्तर पर इस्तेमाल किया जा चुका है। लेकिन यहां एक बड़ा पेंच है।

परियोजनाओं की रफ्तार में क्षेत्रीय असमानता साफ दिखाई देती है। मध्य प्रदेश का इंदौर, गुजरात का सूरत और उत्तर प्रदेश का आगरा इस रेस में काफी आगे निकल गए। इन शहरों ने न सिर्फ फंड का सही इस्तेमाल किया बल्कि इनोवेटिव आइडियाज को भी लागू किया। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भौगोलिक और प्रशासनिक दिक्कतों की वजह से काम की रफ्तार सुस्त रही। इसके अलावा, कई आलोचकों का मानना है कि मिशन का ध्यान पूरे शहर को स्मार्ट बनाने के बजाय 'एरिया बेस्ड डेवलपमेंट' (ABD) यानी शहर के किसी एक खास आधुनिक हिस्से को चमकाने पर ज्यादा रहा। इसने शहर के भीतर ही विकास की एक नई खाई पैदा कर दी है।

व्यावहारिक प्रभाव: आम आदमी की जिंदगी पर क्या असर पड़ा?

इस पूरे तामझाम का आम नागरिक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा, यह जानना सबसे जरूरी है। स्मार्ट वाटर मीटरिंग और सौर ऊर्जा पैनलों की वजह से संसाधनों की बर्बादी में कमी आई है। जिन शहरों में इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) लागू हुआ, वहां चालान कटने के डर से ही सही, लेकिन ट्रैफिक सेंसर के कारण जाम की स्थिति में कुछ सुधार जरूर देखा गया है। सुरक्षा के लिहाज से, विशेषकर महिलाओं के लिए, सड़कों पर लगे पैनिक बटन और सीसीटीवी कैमरों ने एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षा कवच तो दिया ही है।

हालांकि, हर चमकती चीज सोना नहीं होती। आम जनता को अभी भी कई जगहों पर डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण इन स्मार्ट सुविधाओं का पूरा लाभ उठाने में परेशानी हो रही है। ऐप-आधारित नागरिक सेवाएं तो शुरू कर दी गईं, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर नगर निगमों का अमला तकनीकी रूप से दक्ष नहीं होता, तब तक पूरी तरह 'स्मार्ट गवर्नेंस' का दावा करना जल्दबाजी होगी। यह बदलाव धीमा है, लेकिन इसने भारतीय शहरीकरण की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया है।