गांधीजी का वर्ष 1932 का अनशन: एक ऐतिहासिक प्रतिरोध
16 सितंबर, 1932 को पुणे की यरवदा जेल में महात्मा गांधी ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने “जाति के आधार पर चुनावी व्यवस्था का अलगाव” के खिलाफ भूख हड़ताल का सहारा लिया। ब्रिटिश सरकार ने तब भारतीय संविधान के प्रस्तावित ढांचे में एक ऐसा प्रावधान लाने की घोषणा की थी, जिसमें अछूत या दलित वर्ग के लिए अलग चुनावी मतदाता सूची बनाई जानी थी।
गांधीजी इस विचार का जोरदार विरोध कर रहे थे। वे मानते थे कि इससे समाज में जातिगत खाई और गहरी होगी। उनके लिए यह भारत की एकता के खिलाफ था। उन्होंने कहा, “अगर मुझे इस विभाजन को रोकने के लिए अपनी जान देनी पड़े, तो मैं तैयार हूँ।”
यह अनशन पूरे भारत में सनसनी फैला गया। लोग चिंतित हो उठे। अंततः, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर सहित अन्य नेताओं के साथ बातचीत हुई और पूना समझौता हुआ। इसके तहत आरक्षण तो बना रहा, लेकिन अलग मतदाता सूची का प्रस्ताव वापस ले ल
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