धरती मां का सच्चा दुश्मन कौन?
हम सब धरती मां की संतान हैं। लेकिन आज वही संतान उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है। जंगल काटना, हवा और पानी में जहर उगलना, प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग — ये सब मनुष्य की ही देन हैं। हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रकृति के खंडन के साथ।
वनों की कटाई ने जानवरों के घर तहस-नहस कर दिए हैं। नदियाँ गंदगी से भर गई हैं, आसमान धुएं से लाल है। हर साल तापमान बढ़ रहा है, बर्फ पिघल रही है, तूफान और सूखे बढ़ रहे हैं। ये सब किसी दैवी आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि हमारी लापरवाही का असर है।हम सोचते हैं कि प्रगति का मतलब ज्यादा उद्योग, ज्यादा बिल्डिंग, ज्यादा मशीनें। लेकिन क्या यही सच्चाई है? असली दुश्मन कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि हमारी लालची जिंदगी की तर्जीह है। प्रकृति के साथ युद्ध नहीं, उसके साथ तालमेल बिठाना ही सच्ची प्रगति है।
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