पवित्रता का अर्थ क्या है?

पवित्र शब्द सुनते ही मन में धार्मिक छवियाँ आ जाती हैं – मंदिर की गंगाजल से लीपी गई दीवारें, फूलों से सजी मूर्तियाँ, या कार्तिक मास में जागरण करते भक्त। लेकिन पवित्रता सिर्फ स्थान या समय तक सीमित नहीं है। यह एक भावना है, एक ऐसा वातावरण जहाँ मन एकान्त में बैठकर ईश्वर से जुड़ सके।

कुंद का फूल भी पवित्र माना जाता है – तो क्या केवल वस्तुएँ ही पवित्र होती हैं? नहीं। थोकदार नरसिंह एक साधारण व्यक्ति को भी “पवित्र भूमि” कहते हैं, मतलब इंसान भी पवित्र हो सकता है। यहाँ तक कि चूहे को भी पवित्र माना गया है – जैसे काबा में, जहाँ वे भी पूजे जाते हैं।

एक शायर लिखता है – "जब तेरे पवित्र चश्मों को छूने आई तो..."। यहाँ पवित्रता आँखों में नहीं, उस छुए जाने के पल में है। वह पल, जब भावना शुद्ध हो जाए।

मनुस्मृति कहती है – श्रमिक का हाथ सदैव पवित्र रहता है। मतलब पवित्रता गंदगी से नहीं, ईमानदारी से आती है। काम करने वाला हाथ,

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