पुरानी और नई फिल्मों में अंतर: भावना बनाम धमाल
आजकल की फिल्में देखकर लगता है कि जैसे स्क्रीन पर कोई धमाल मचाने आ गया हो। धमाके, झूठे एक्शन सीन्स, और अवास्तविकता इतनी बढ़ गई है कि अब फिल्म देखना कई बार थकान भरा लगने लगता है। एक छोटा सा हीरो बिना रुके पचास-पचास लोगों को उड़ा देता है, और वह भी बिना थके। ऐसे सीन्स देखकर मन में सवाल उठता है—क्या यह अब फिल्म बन गई है या कोई वीडियो गेम?
लेकिन जब हम पुरानी फिल्मों की बात करते हैं, तो दिल को छू लेने वाली कहानियाँ, साधारण ढंग से बुने गए संवाद, और जीवन के करीब भावनाएँ याद आती हैं। उस जमाने की फिल्मों में इतनी भसड़ नहीं होती थी। वहाँ हीरो भी इंसान लगता था, न कि कोई सुपरमैन। उसकी लड़ाईयाँ, उसके दर्द, सब कुछ वास्तविक लगता था।
आज की तकनीक ने निश्चित तौर पर फिल्म बनाने के तरीके बदल दिए हैं, लेकिन क्या इसने कहानी की गहराई बढ़ाई है? शायद नहीं। कई बार तो लगता है कि फिल्ममेकर
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