आत्मा का स्वभाव: स्थायी और अस्थायी

आत्मा के स्वभाव को समझने के लिए दो शब्दों पर ध्यान देना ज़रूरी है—नित्य और नैमित्तिक। नित्य स्वभाव वह है जो सदा से है और सदा रहेगा। यह आत्मा का असली स्वरूप है। जैसे पानी का स्वभाव तरलता होती है, वैसे ही आत्मा का मूल स्वभाव है—ज्ञान, चेतना और अनंतता। यह कभी नहीं बदलता।

दूसरी ओर, नैमित्तिक स्वभाव वह है जो किसी कारण विशेष से आता है—क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या। ये गुण आत्मा के नहीं, बल्कि शरीर और मन से जुड़े हैं। जैसे बादल आकाश को ढक लेते हैं, वैसे ही ये भाव हमारी आत्मा की चमक को ढक देते हैं। लेकिन आत्मा स्वयं उनसे मुक्त रहती है।

हम अक्सर अपने व्यवहारों को अपना सच मान लेते हैं—गुस्सा आया तो सोचते हैं कि हम गुस्सैल हैं। लेकिन वास्तव में वह सिर्फ एक अस्थायी स्थिति है। आत्मा का असली स्वभाव शांत, प्रेममय और अपरिवर्तनीय है।

जब हम इस सच को समझते हैं, तो जीवन में उलझनें कम होने लगती ह

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