बच्चे: भगवान का सच्चा स्वरूप

क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चों को भगवान का रूप क्यों कहा जाता है? इस सवाल का जवाब छोटी सी बात में छिपा है—निर्मलता

बच्चे मन से साफ होते हैं। उनके विचार, उनकी भावनाएं और उनका व्यवहार—सब कुछ एक जैसा होता है। जो दिल में होता है, वही मुंह से निकलता है। न झूठ, न दिखावा, न अपने विचार छिपाने की कोशिश। वे बिना डरे, बिना हिचके वैसा ही बोलते और करते हैं जैसा सोचते हैं।

इसी निर्मलता के कारण लोग कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप हैं। भगवान को भी तो सच्चाई, प्यार और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। बच्चों में यही गुण होते हैं। वे नासमझ नहीं होते, बस दुनिया की तरक्की के नाम पर छुपाए गए झूठ से अछूते होते हैं।

हम बड़े होकर अक्सर डर के कारण या समाज के दबाव में अपनी सच्चाई छिपाने लगते हैं। लेकिन बच्चे नहीं छिपाते। वे तो वैसे ही होते हैं जैसा भगवान होना चाहता है—ईमानदार, निर्भय और भावनाओं से भरे।

शाय

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