क्यों मनुष्य पाप करता है, चाहे न चाहता हुआ?

मनुष्य अक्सर ऐसा कर जाता है जिसके बाद वह खुद भी पछताता है। कई बार वह पाप करता है, भले ही उसका मन न करता हो। ऐसा क्यों होता है? इसका उत्तर गहरा है।

कामना ही मूल जड़ है।

जैसे अग्नि धुएँ के बिना नहीं रह सकती, वैसे ही मनुष्य के मन में कामना के बिना लोभ और क्रोध नहीं टिकते। यही कामना धीरे-धीरे बढ़कर मन पर छा जाती है। तब इंद्रियाँ उसके पीछे भागने लगती हैं, बुद्धि धुंधली हो जाती है, और अहंकार इतना बढ़ जाता है कि सही-गलत का भेद मिट जाता है।

विषयों—सुख, संपत्ति, मान-सम्मान—की तलाश में मनुष्य कभी-कभी उन सीमाओं को पार कर जाता है, जिन्हें पार करना उसके हित में नहीं होता। यहीं से पाप की शुरुआत होती है।

कामना ही पतन का कारण है।

जब तक मनुष्य इस कामना को नहीं जीत लेता, वह चाहे जितनी भी अच्छी शिक्षा ले ले, जितने भी धार्मिक ग्रंथ पढ़ ले, फिर भी कभी न कभी पाप में फंस जाता है। इसीलिए कहा गया है—कामना

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