भारत द्वारा पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिए जाने का ऐतिहासिक सच

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय दोनों देशों के बीच संपत्ति और संसाधनों का बंटवारा भी एक बेहद जटिल मुद्दा था। विभाजन के समझौते के तहत, भारत को पाकिस्तान को कुल 55 करोड़ रुपये की नकद राशि देनी थी। यह राशि दोनों देशों के बीच वित्तीय संपत्तियों के शांतिपूर्ण हस्तांतरण का हिस्सा थी, जिसे शुरुआती दौर में भारत सरकार ने सुरक्षा और कश्मीर विवाद के चलते रोक दिया था।

इस फैसले में एक बड़ा मोड़ तब आया जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सांप्रदायिक दंगों को रोकने और दोनों देशों के बीच शांति व सद्भाव बहाल करने के लिए अनशन (भूख हड़ताल) शुरू कर दिया। गांधी जी का मानना था कि वादे के मुताबिक पाकिस्तान को उसका हक न देना नैतिक रूप से गलत होगा और इससे दोनों देशों के बीच दुश्मनी और गहरी हो जाएगी।

गांधी जी के इस कड़े रुख और उनकी भूख हड़ताल के तीसरे दिन, यानी 15 जनवरी 1948 को भारत सरकार ने अपने फैसले को बदलते हुए घोषणा की कि वह पाकिस्तान को तत्काल 55 करोड़ रुपये जारी करेगी। सरकार का यह कदम गांधी जी के जीवन को बचाने और देश में शांति का माहौल बनाने के लिए उठाया गया था।

हालांकि, सरकार के इस फैसले का एक गंभीर और दुखद पहलू भी रहा। इस घोषणा से देश के कुछ उग्रपंथी हिंदू संगठन और व्यक्ति बेहद नाराज हो गए। उनका मानना था कि गांधी जी का यह कदम पाकिस्तान के प्रति तुष्टिकरण की नीति का हिस्सा था। यही नाराजगी और गुस्सा अंततः महात्मा गांधी की हत्या के तात्कालिक कारणों में से एक बना, जिसके कुछ ही दिनों बाद 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई।

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