हज यात्रा और काला पत्थर: एक आध्यात्मिक सफर

हज इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है और हर उस मुस्लिम के लिए फर्ज है, जो शारीरिक व माली रूप से सक्षम हो। यह यात्रा मक्का में स्थित काबा के चारों ओर तवाफ करने की होती है, जहाँ काबा के पूर्वी कोने में एक काले पत्थर को जड़ा गया है, जिसे हजर-ए-अस्वद कहते हैं।

कई लोगों के बीच यह धारणा भी है कि यह पत्थर प्राचीन समय में कहीं शिवलिंग के रूप में स्थापित था, लेकिन इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, यह पत्थर आदम को जन्नत (स्वर्ग) से उतारा गया था। कहा जाता है कि यह नबियों के समय से ही पवित्र माना जाता रहा है।

हज के दौरान लाखों तीर्थयात्री काबा की परिक्रमा करते हैं और जहाँ तक संभव हो, काले पत्थर को छूने या उसकी ओर इशारा करने का प्रयास करते हैं। यह क्रिया इब्राहीम की सुन्नत के अनुसार होती है, न कि पत्थर की पूजा के रूप में। मुस्लिम केवल अल्लाह की इबादत मानते हैं, और यह तीर्थ उनके आस्था, विनम्रता और एकता का प्रतीक है।

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