सुदामा का चावल का उपहार: सरलता की अमूल्य भेंट
जब सुदामा द्वारका पहुँचे, तो उनके हृदय में मित्रता का प्रेम था, लेकिन मन में संकोच। उनकी पत्नी ने कृष्ण के लिए प्यार भरे भाव से थोड़े से चावल एक पोटली में बाँध दिए थे। लेकिन जैसे ही सुदामा ने द्वारका का वैभव देखा—भव्य भवन, शाही आराम, राजसी विलास—तो वे शर्मिंदा हो गए।
इतने बड़े राजा को चावल कैसे दूँ?यही सोचकर वे उस पोटली को छुपाने लगे। उन्हें लगा कि यह उपहार इतने शाही दरबार में हास्यास्पद लगेगा। लेकिन कृष्ण की दृष्टि में वह चावल कोई सामान्य चीज़ नहीं थी। वह प्रेम का प्रतीक था, सरलता की अमूल्य भेंट। जब कृष्ण ने पोटली देखी और उसका स्वाद लिया, तो वे आनंद से भर उठे।
कृष्ण ने न तो वैभव की परवाह की, न उपहार की मात्रा देखी। उन्होंने सिर्फ़ भाव देखा। और इसी भाव के कारण वे सुदामा के जीवन को रूपांतरित कर देते हैं। कहानी सिखाती है कि सच्चा प्रेम और निष्काम भाव कभी तुच्छ नहीं होता—चाहे उपह
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