राधा का विलय: प्रेम का अमर अध्याय

राधा की मृत्यु की कोई सांसारिक तिथि नहीं है, क्योंकि उनका जीवन और अंत दोनों आध्यात्मिकता में लिपटे हैं। कहा जाता है कि एक रात, जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजा रहे थे, राधा उस धुन में इतनी खोई कि उनका आत्मा धीरे-धीरे भगवान कृष्ण में विलीन हो गया। बांसुरी की मधुर तान में उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

यह कोई साधारण वियोग नहीं था। यह प्रेम का उच्चतम रूप था—एक ऐसा योग, जहां प्रेमिका प्रेम के स्वरूप में ही लीन हो गई। कृष्ण जानते थे कि राधा की आत्मा उनसे कभी अलग नहीं हुई, फिर भी उस विछोड़े ने उनके हृदय को छलनी कर दिया। कहते हैं, उस रात के बाद कृष्ण ने कभी बांसुरी नहीं बजाई।

राधा का अंत मृत्यु नहीं, बल्कि एक पूर्णता की ओर संक्रमण था। उनका प्रेम इतना शुद्ध और गहरा था कि वह शरीर के पार आत्मा तक पहुंच गया। आज भी गीतगोविंद और भजनों में राधा-कृष्ण के विछोड़े की कहानी आंसू ला देती है। उनका प्रेम न तो सम

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