बांसुरी की दिव्य उत्पत्ति
भगवान शिव के ध्यान में एक बात स्पष्ट हुई कि उनके पास ऋषि दधीचि की अद्भुत शक्तिशाली हड्डी रखी हुई थी। यह हड्डी सिर्फ एक हड्डी नहीं थी, बल्कि तपस्या और बलिदान की पराकाष्ठा का प्रतीक थी। इसी हड्डी को लेकर शिव जी ने कुछ अद्भुत करने का निश्चय किया।
एक साधारण सी हड्डी से अमर संगीत का साधन बन गया।उन्होंने उस हड्डी को सूक्ष्मता से घिसकर एक मनमोहक बांसुरी तैयार की। यह बांसुरी सामान्य नहीं थी—इसमें दधीचि के तेज और शिव की कृपा का संगम था। फिर शिव जी गोकुल की ओर चल पड़े, जहाँ बाल गोपाल श्रीकृष्ण अपनी मुरली के साथ वन में नृत्य करते थे।
शिव जी ने उस दिव्य बांसुरी को श्रीकृष्ण के हाथों में रख दिया। यह कोई साधारण भेंट नहीं थी, बल्कि एक दिव्य संदेश था—संगीत, प्रेम और आत्मा की गहराई को पहचानने का। तब से लेकर आज तक वह बांसुरी कृष्ण के अधरों पर रही और उनके संगीत ने गोकुल से लेकर वृंदावन तक को मुग्ध कर दिया।
इस कथा में सिर्फ ए
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