कृष्ण ने बांसुरी क्यों तोड़ी थी?

हर ग्वाला नटखट कृष्ण की बांसुरी का तान गोपियों के मन को झकझोर देता था। वह बांसुरी सिर्फ एक वाद्य नहीं थी—उसमें तो कृष्ण का प्रेम, उनकी लीला, सब कुछ बसा था। लेकिन जब गोपियाँ, वृंदावन के स्नेह की आत्मा, धीरे-धीरे अपने घर लौटने लगीं, तो वहीं से सब कुछ बदल गया।

जब गोपियाँ जाने लगीं, तो कृष्ण का हृदय टूट गया।

उनका स्नेह, संगीत, सब उसी पल अधूरा लगा। वह बांसुरी, जो दिन भर गुंजाती रहती थी, उस दिन चुप हो गई। कृष्ण ने उसी क्षण उसे तोड़कर झाड़ियों में फेंक दिया। वह बांसुरी अब बेमानी थी। गोपियों की अनुपस्थिति में उसका स्वर भी व्यर्थ था।

यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि प्रेम की एक गहरी अभिव्यक्ति थी। कृष्ण ने बांसुरी इसलिए नहीं तोड़ी कि वह टूट गई हो, बल्कि इसलिए क्योंकि उसका अस्तित्व गोपियों के बिना अधूरा था। प्रेम जब सच्चा होता है, तो उसके विरह में भी एक सुन्दरता होती है।

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