गीता के अनुसार मनुष्य का धर्म क्या है?

श्रीमद्भगवद्गीता मानव जीवन के लिए एक अमूल्य मार्गदर्शक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन, कर्म और धर्म के बारे में गहरे सत्य बताते हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य को जीवन में क्या करना चाहिए? गीता के अनुसार, मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है – निष्काम कर्म

भगवान कृष्ण कहते हैं कि आप अपने कर्म करें, लेकिन उसके फल की चिंता न करें। हर कार्य को ईश्वर को समर्पित करके करें। जब आप निष्काम भाव से कर्म करते हैं, तो न तो मन बिगड़ता है, न हृदय में पछतावा बचता है। गीता सिखाती है कि जैसा कर्म, वैसा फल। अतः सदैव सत्कर्म करने की आवश्यकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम केवल अच्छे काम करें और फिर परिणाम भूल जाएँ। बल्कि, फल की लालसा छोड़कर कर्म करना ही सच्चा धर्म है। गीता के ये सिद्धांत न केवल आध्यात्मिक जीवन में, बल्कि आज के तनाव भरे समय में भी हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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