मनुष्य के सात आंतरिक शत्रु: विनाश का मार्ग

सनातन परंपरा और विभिन्न दर्शनों में हमेशा से इस बात पर जोर दिया गया है कि इंसान का सबसे बड़ा मुकाबला किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि उसके खुद के भीतर छिपे विकारों से होता है। इन विकारों को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति के चरित्र और जीवन दोनों को नष्ट कर देते हैं।

इनमें सबसे पहला और घातक शत्रु है अहंकार (Pride)। आज के दौर में जब दुनिया 'मैं' और 'खुद की छवि' के इर्द-गिर्द सिमट रही है, अहंकार इंसान को अंधा बना देता है। इसके बाद आती है ईर्ष्या (Envy), जो दूसरों की खुशी देखकर पैदा होती है और इंसान के मन की शांति को पूरी तरह छीन लेती है। लोभ (Greed) और मोह या अत्यधिक उपभोग (Gluttony) ऐसे अवगुण हैं, जो इंसान की संतुष्टि को खत्म कर देते हैं। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं और असुरक्षाओं पर नियंत्रण खो देता है, तो वह पतन की ओर बढ़ने लगता है।

इसके अलावा काम (Lust) और क्रोध (Anger) मनुष्य के विवेक को हर लेते हैं। गुस्से में लिया गया एक भी फैसला पूरे जीवन को तबाह करने के लिए काफी होता है। अंत में आता है आलस्य (Sloth), जो इंसान की कर्म करने की क्षमता को मार देता है। यदि समय रहते इन आंतरिक शत्रुओं को न पहचाना जाए और इन पर नियंत्रण न पाया जाए, तो ये किसी भी हंसते-खेलते जीवन को विनाश के गर्त में धकेल सकते हैं। आत्म-नियंत्रण और सजगता ही इनसे बचने का एकमात्र उपाय है।

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