शरीर: उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच झूलता सत्य
शरीर सिर्फ एक भौतिक ढांचा नहीं है — वह एक साथ कई भूमिकाएं निभाता है। वह वही है जिसे हम देखते हैं और जिसे हम महसूस करते हैं, लेकिन साथ ही वह वह भी है जो कभी-कभी गायब-सा लगता है, खासकर तब जब हम गहरी भावनाओं में खो जाते हैं।
जब हम जोर से हंसते हैं या दर्द में कराहते हैं, शरीर पूरी तरह उपस्थित होता है — एक सक्रिय, संवेदनशील उपकरण की तरह। लेकिन भावनाओं के तूफान में, जैसे प्यार या डर में, शरीर कभी-कभी गायब-सा लगता है, मानो वह अपने आप से अलग हो गया हो।
इस विरोधाभास में ही शरीर की गहराई छिपी है। यह एक ओर वह चीज है जिस पर हम काम करते हैं — खेल, योग, या आहार के माध्यम से, तो दूसरी ओर यह वही है जो हमारे अस्तित्व की नींव बनता है। यह न तो सिर्फ ज्ञान का विषय है, न ही सिर्फ संवेदना का स्रोत — यह दोनों है।
शरीर इसलिए रहस्यमय है क्योंकि वह सदा सामने होते हुए भी कभी-कभी पूरी तरह अनुपस्थ
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