बिना के तार और उसकी विशेषताएं

बिना भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण वाद्य है। इसमें आमतौर पर चार तार होते हैं, जो इसे सितार या तानपूरा जैसे वाद्यों से अलग करते हैं। यह तार चिकने और फ्रेटरहित होते हैं, यानी तारों के सहारे कोई विभाजन (fret) नहीं होता।

इस विशेषता के कारण बिना के तारों पर बहुत सूक्ष्म झीलाएं, मींड और रागीय अंगों को आसानी से निकाला जा सकता है। फ्रेट की अनुपस्थिति वादक को शुद्ध स्वरों और गहरे भावों को व्यक्त करने में मदद करती है। इसी कारण बिना को प्राचीन राग संगीत के लिए अत्यधिक उपयुक्त माना जाता है।

दूसरी ओर, सितार में फ्रेट होते हैं, जो तारों को दबाने पर निश्चित स्वर देने में सहायता करते हैं। लेकिन बिना में इसकी कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि इसका उद्देश्य शुद्धता और आंतरिक भावना को जगाना होता है।

यही कारण है कि आज भी कई गायक और वादक बिना को संगीत की आत्मा कहते हैं। बिना के चार तार न सिर

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