माँ की याद में डूबा लेखक

निराशा और भय से घिरे पलों में लेखक को माँ की याद आई। वह पल ऐसा था जब वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था। उसके अंदर उफ़ान उमड़ रहा था—आँसू बह निकले, और तब दिल चाहा कि काश, माँ होतीं वहाँ। उसे लगा, माँ की गोद ही एकमात्र जगह है जहाँ डर भाग जाता है।

वह चाहता था कि माँ आकर उसे छाती से लगा लें, उसके सिर पर हाथ फेरें और प्यार से कह दें—"कोई बात नहीं, बेटा। चिट्ठियाँ फिर लिख ली जाएँगी।" ये शब्द मानो जादू की तरह थे—एक बार सुने तो दिल को शांति मिल जाए।

लेखक को विश्वास था कि माँ ही वह एकमात्र व्यक्ति थी जो उसकी तकलीफ़ को समझ सकती थी। न सिर्फ़ डाँट-डफ़तर से बचाने के लिए, बल्कि उसके दर्द को भी शब्द देने के लिए। उस पल माँ की याद न सिर्फ़ एक स्मृति थी, बल्कि एक तड़प थी—एक आकांक्षा थी कि काश, वह वहाँ होतीं और उसकी दुनिया को फिर से सुरक्षित कर देतीं।

क्योंकि माँ के प्यार में जो सांत्वना होती है, वह दुनिया के क

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