गांधी के अनुसार स्वदेशी क्या है?

स्वदेशी की अवधारणा महात्मा गांधी के लिए सिर्फ एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। उन्होंने 1905 में बंगाल विभाजन के खिलाफ उठे स्वदेशी आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए इसे एक जन आंदोलन का रूप दिया। उनका मानना था कि अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करके और भारत में बनी चीजों, खासकर खादी के समर्थन से, भारत न केवल आर्थिक रूप से सशक्त होगा, बल्कि राष्ट्रीय एकता की भावना भी मजबूत होगी।

गांधी जी के लिए स्वदेशी सिर्फ कपड़े तक सीमित नहीं था। यह एक जीवन शैली थी जो स्थानीय उत्पादों, स्थानीय कारीगरों और ग्राम उद्योगों को बढ़ावा देती थी। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे विदेशी कपड़ों को जला दें और चरखे पर कताई कर अपने घरों में खादी बुनें। इससे न केवल ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचता था, बल्कि गाँवों में रोजगार के अवसर भी पैदा होते थे।

स्वदेशी गांधीजी के स्वराज

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