गीता में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण
श्रीमद्भगवद्गीता में स्त्री के बारे में सीधे तौर पर बहुत कम बात कही गई है, लेकिन कुछ श्लोकों में उसकी सामाजिक और आध्यात्मिक भूमिका झलकती है। एक जगह कृष्ण कहते हैं कि जब अधर्म बढ़ जाता है, तो कुलस्त्रियाँ (परिवार की स्त्रियाँ) प्रदूषित हो जाती हैं, और उसके परिणामस्वरूप वर्णसंकर (समाज में व्यवस्था का विघटन) होता है।
यहाँ स्त्री को केवल घर-परिवार की संरक्षक नहीं, बल्कि समाज के नैतिक स्तर का दर्पण माना गया है। इसका यह मतलब नहीं कि स्त्री अशुद्ध होती है, बल्कि यह संकेत है कि जब समाज का धर्म ढलता है, तो परिवार की स्त्रियों पर भी उसका बुरा प्रभाव पड़ता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बात गीता के उस श्लोक में है, जहाँ कृष्ण कहते हैं कि जो भी मेरा शरण लेते हैं — चाहे वे किसी भी वर्ग के हों, चाहे स्त्री हों, वैश्य या शूद्र — वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
यह श्लोक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि आध्यात्म
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